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Monday, July 19, 2021

Tokyo Olympics 2020: भारत के ओलंपिक इतिहास का वो लम्हा जब मिल्खा सिंह बने “द फ्लाइंग सिख”

 


टोक्यो 2020 की उलटी गिनती अब अपने अंतिम चरण में है। एक नए ओलंपिक अभियान से पहले हम नज़र दाल रहे हैं भारतीय ओलंपिक इतिहास के सबसे यादगार पलों पर। आज जानिये 1960 रोम ओलंपिक खेलों के उस क्षण के बारे में जब महान धावक स्वर्गीय श्री Milkha Singh ने इतिहास की किताब में अपना नाम लिखा था।

भारत का एथलेटिक्स इतिहास जब भी लिखा जायेगा तो उस पुस्तक में सबसे पहले आने वाले नामों में स्वर्गीय धावक Milkha Singh होंगे। एथलेटिक्स एक ऐसी प्रतियोगिता है जिसमे भारत का अनेक खिलाड़ियों ने प्रतिनिधित्व किया है और उनमे से कई प्रतिभाशाली भी रहे हैं लेकिन कोई भी आज तक पदक नहीं जीत पाया। अगर उन खिलाड़ियों की श्रेणी में कोई ऐसा खिलाड़ी था जो पदक जीत सकता था तो वह नाम Milkha Singh है।

रोम 1960 से पहले स्वर्णों की माला

देश के विभाजन से पहले वर्तमान पाकिस्तान में जन्मे Milkha Singh स्वतंत्रता के एक दशक बाद एथलेटिक्स जगत में ऐसी धूम मचा रहे थे कि उनको हरा पाना किसी भी धावक के लिए बहुत बड़ी सफलता थी। साल 1958 में उन्होंने टोक्यो में आयोजित हुए एशियाई खेलों में स्वर्ण जीता और 400 मीटर दौड़ में ऐसा करने वाले पहले भारतीय धावक बने। उसी वर्ष कार्डिफ में आयोजित हुए कॉमनवेल्थ खेलों में भी उन्होंने स्वर्ण अपने नाम कर लिया और पूरे विश्व में वह एशिया के सबसे बेहतरीन धावकों में से एक के रूप में प्रसिद्ध हुए।

साल 1960 के रोम ओलंपिक खेलों से पहले यह माना जा रहा था Milkha का पदक जीतना लगभग तय है क्योंकि एशिया में कोई धावक उनकी बराबरी नहीं कर सकता था। वहीं दूसरी ओर उनके फॉर्म को देखते हुए यह भी कहा गया कि ओलंपिक खेलों में वह उस समय के 400 मीटर विश्व रिकॉर्ड को भी तोड़ सकते थे।

खेलों में छोटी सी चूक और ओलंपिक पदक का सपना गया टूट

इटली की राजधानी रोम में आयोजित हुए 1960 ओलंपिक खेलों में Milkha Singh ने 400 मीटर दौड़ में शानदार शुरुआत करते हुए हीट अथवा क्वार्टर फाइनल में आने वाली दौड़ में अपने प्रदर्शन का एक बड़ा संकेत दिया। फाइनल में उन्होंने अपनी जगह आसानी से बना ली और उनका पदक जीतना लगभग तय माना जा रहा था।

रोम ओलंपिक खेलों की 400 मीटर प्रतियोगिता शुरू हुई और भारत के इस महान धावक ने दौड़ में बढ़त बना ली और पहले 250 मीटर तक ऐसा लगा की भारत के गले एथलेटिक्स ओलंपिक पदक लगभग आ चुका है। उसेक बाद जो हुआ वह 20 से 25 सेकंड Milkha Singh अपने पूरे जीवन शायद नहीं भूले। दौड़ के अंतिम 100 मीटर में उनकी गति धीरे हो गयी और दक्षिण अफ्रीका के Malcolm Spence को उनसे आगे निकलने का मौका मिल गया।

जब तक Milkha Singh को यह बात पता लगी तब तक दौड़ समाप्त हो चुकी थी और वह 0.1 सेकंड की देरी के कारण पदक से वंचित रह गए। उनके अपने शब्दों में Milkha ने बताया की उन्होंने एक बहुत बड़ी भूल उस फाइनल में करि जिसके कारण शायद कांस्य ही नहीं उनका रजत पदक भी रह गया। अंत में भारत के धावक ने 400 मीटर की दौड़ को 45.6 सेकंड में पूरा किया जो एक राष्ट्रिय रिकॉर्ड तो था लेकिन उन्हें ओलंपिक पदक नहीं दिला पाया।

ओलंपिक पदक नहीं लेकिन अमर है Milkha की गाथा

उस समय भारत के लिए ओलंपिक में एथलेटिक्स पदक जीतने के इतना समीप शायद ही कोई खिलाड़ी आया था और उन्होंने रोम 1960 खेलों के बाद अपना अच्छा फॉर्म जारी रखा। दो वर्ष बाद उन्होंने एक बार फिर एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता और अंतर्राष्ट्रीय सफलता का एक और अध्याय अपने खेल जीवन में जोड़ा।

उनके द्वारा स्थापित किया गया राष्ट्रिय रिकॉर्ड चार दशक तक नहीं टूटा और Milkha Singh ने आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरणा दी और भारत के लिए खेलने में सहायता करि। रोम में उनके कारनामे ने कई खिलाड़ियों और युवाओं को प्रेरित किया और आज भी कई महान खिलाड़ी स्वर्गीय Milkha Singh को अपना आदर्श मानते हैं।

भारत को ओलंपिक खेलों में एथलेटिक्स पदक जीतते हुए देखना उनका सपना था लेकिन कोरोना महामारी के कारण जून 2018 2021 को उनका निधन हो गया। टोक्यो 2020 ओलंपिक खेलों से पहले पूरे भारतीय और विश्व खेल जगत के लिए यह बहुत दुखद समाचार था और सबने Milkha Singh को अपनी श्रद्धांजलि प्रकट करी।

श्री Milkha Singh भले ही टोक्यो 2020 खेलों को नहीं देख पाए लेकिन अगर भारत अपना पहला एथलेटिक्स पदक जीत पाता है तो उनका आशीर्वाद और उनके 1960 के शौर्य की गाथा का इस सफलता में बहुत बड़ा श्रेय होगा।

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