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Wednesday, March 17, 2021

इस तारीख से लग रहा होलाष्टक, इन सामग्री से करें पूजा, जानें क्या है कथा


हर साल होली का त्यौहार फाल्गुन माह की शुक्लपक्ष में मनाया जाता है। होली के त्यौहार के पहले ही होलाष्टक लग जाता है। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से लग जाता है। इसके बाद जब पूर्णिमा के दिन आता है, तो ये होलिका दहन के साथ ही समाप्त हो जाता है। धार्मिक मान्यता है कि होलाष्टक के समय किसी तरह के कोई भी मंगल कार्यों को नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि इस दौरान जितना ज्यादा हो सकें मन को पूजा पाठ और भगवान के भजनों में ही लगाना चाहिए। जब होली का पर्व समाप्त होगा, उसके बाद से ही शुभ कार्यों की शुरुआत की जाएगी। होली के पहले के आठ दिन हर शुभ कार्य करना वर्जित होगा। माना जाता है कि होलाष्टक के समय भगवान भक्त प्रह्लाद को जो पीड़ाएं दी गई थी, उनको याद रखन के लिए होलाष्टक मनाया जाता है। होलाष्टक के पीछे भक्त प्रहलाद की कथा भी चर्चित है।

होलाष्टक की कथा
राक्षसों के राजा  हिरण्यकश्यप और उनके बेटे भक्त प्रह्लाद की कथा के बारे में तो सबकों पता होगा। इस कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद पैदाइशी ही हरि के भक्त थे। इसी के विपरीत वहीं उनके पिता हिरण्यकश्यप को भगवान विष्णु से घृणा थी। हिरण्यकश्यप  ने अपने बेटे प्रहलाद को हरि की भक्ति न करने के लिए बहुत बार समझाया, लेकिन जब प्रहलाद पर अपने पिता की बातों का कोई असर नहीं हुआ, तो पिता ने अपने पुत्र के मन में उनका भय उत्पन्न करने के लिए प्रहलाद को कई तरह की यातनाएं और पीड़ाएं देना शुरु कर दिया। फिर भी भक्त प्रहलाद पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा, जिसके बाद हिरण्यकश्यप ने गुस्से में आकर अपने सैनिकों को प्रह्लाद को पहाड़ी से नीचे फेंक देंने के आदेश दिया।

स्वामी की बात को मानकर सैनिकों ने ऐसा ही किया, लेकिन जब प्रहालाद को ऊपर पहाड़ी से नीचे फेंका तो साक्षात भगवान विष्णु ने आकर  अपने भक्त को गोद में ले लिया और प्रहलाद की जान बच गई। इसके बावजूद भी हिरण्यकश्यप की यातनाएं खत्म ना हुईं और अंत में उन्होंने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को लेकर आग में बैठ जाएं, जिससे प्रह्लाद जल के राख हो जाएं। ऐसा इसलिए क्योंकि होलिका को भगवान से ये वरदान मिला था कि वो कभी भी आग से नहीं जल सकती हैं। अपने भाई हिरण्यकश्यप की बात मानकर होलिका भतीजे प्रह्लाद को लेकर बैठ गयीं, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से आग की लपटें भी भक्त प्रह्लाद का कुछ बिगाड़ नहीं पाईं। बल्कि इसके विपरीत होलिका ही आग की लपटों में जलने लगी। ऐसा माना जाता है कि उसी दिन ही फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी थी, उस दिन से होलाष्टक मनाया जाने लगा।
इसके अलावा एक और कथा प्रचलन में हैं। फाल्गुन मास की अष्टमी तिथि कामदेव को भगवान शिव ने भस्म कर दिया था, जिसके बाद पूरी पृथ्वी में दुख भर गया और सबने शुभ कार्य करना भी बंद कर दिया था।
क्या होनी चाहिए पूजा सामग्री

पूजा सामग्री में एक लोटा जल, माला, रोली, चावल, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल आदि का होना जरूरी है। इसके अलावा भी नई फसल के धान जैसे कि पके हुए चने की बालियां व गेहूं की बालियां भी सामग्री के रूप में पूजा में इस्तेमाल होती हैं। इसके अलावा होलिका के पास गोबर से बनी हुई ढ़ाल और अन्य खिलौने भी रखे जाते हैं। इसी के साथ होलिका दहन होने के बाद होलिका में जिन-जिन वस्तुओं की आहुति दी जाती है, उनमें से कच्चे आम, नारियल, भुट्टे या सप्तधान्य, चीनी के बने हुए खिलौने, नई फसल का कुछ भाग भी मुख्य है। सप्तधान्य : गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर भी अर्पित की जानी चाहिए।

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