इस अनोखी दास्तां के कारण इस किले का नाम पड़ा ‘कुंवारा किला’

 


भारत देश में कई सारे किले(fort) हैं, हर किले की अपनी कहानी है। आज के इस आर्टिकल में हम आपकों ऐसे ही एक किले के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका नाम कुंवारा किला है। ये किला अलवर में हैं। ये वहां की सबसे पुरानी इमारत है। ऐसा कहा जाता है कि 1492 ईस्वी में हसन खान मेवाती ने इस किले का निर्माण करवाया था। पूरे देश में ये किला अपनी रचना के कारण प्रसिद्ध है। मुगलो से लेकर मराठों और जाट के लोगों ने इस किले पर शासन किया है। आइए जानते है इस किले के कुछ खास बातें..

किले की खासियत 

बता दें कि इस किले की जो दिवारें है, उसमें 446 छेद हैं, इन छेद का निर्माण केवल दुश्मनों पर गोलियां की बौछार करवाने के लिए किया गया था। ये छेद इतने बड़े थे कि 10 फुट की बंदूक से भी इसमें गोलियां चलाई जा सकती थी। इतना ही नहीं दुश्मनों के कार्यों पर नजर रखने के लिए इस किले में 15 बड़े,  3359 कंगूरे  और 51 छोटे बुर्ज भी बनवाए गए थे।

कहा जाता है कि कभी भी इस किले में युद्ध नहीं हो पाया, जिसके कारण इस किले का नाम ‘कुंवारा किला’ पड़ा। इस किले का निर्माण पहाड़ो पर हुआ है।  ये किला पांच किलोमीटर लंबा और करीब 1.5 किलोमीटर चौड़ा है। प्रवेश करने के लिए किले में 6 दरवाजे बनाए गये है। जिनको अलग अलग नाम भी दिये गये हैं। जैसे जय पोल, सूरज पोल, लक्ष्मण पोल, चांद पोल, कृष्णा पोल और अंधेरी पोल। बताया जाता है कि मुगल शासक बाबर और जहांगीर भी इस किले में ठहर चुके हैं। केवल एक रात के ले बाबर ने रुके थे।

इस किले पर 1775 में इस किले पर माहाराव राजा प्रताप सिंह ने राज किया था। अपनी वास्तुकला के लिए ये किला काफी प्रसिद्ध है। अंदर से ये किला कई भागों में बटा हुआ हैं।

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