बल्लेबाज के तौर पर चयन, बन गये नेट बॉलर, सौरव गांगुली ने सुनाया टीम इंडिया से ड्रॉप होने की कहानी!

 

बल्लेबाज के तौर पर चयन, बन गये नेट बॉलर, सौरव गांगुली ने सुनाया टीम इंडिया से ड्रॉप होने की कहानी!

हर किसी के जीवन में अच्छा और बुरा दौर आता है, लेकिन मुश्किल समय में भी जिनके पैर डगमगाते नहीं या बहकते नहीं, एक ना एक दिन सफलता उनके कदम चूमती है, इसी कैटेगरी में टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली भी आते हैं, करियर के बुरे दौर से गुजरकर टीम में वापसी करना, भारतीय टीम की कमान संभालना और दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष बनना उनकी सफलता की ही निशानी है।

वापसी के लिये मेहनत
एक समय था, जब टीम इंडिया से ड्रॉप होने के बाद उन्हें वापसी के लिये बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ी, वो सिर्फ बल्लेबाजी की ही नहीं बल्कि गेंदबाजी की भी प्रैक्टिस करते थे, गांगुली ने गौरव कपूर के टॉक शो में बताया था कि sourav ganguly2टीम इंडिया से ड्रॉप होने के बाद मैं नेट बॉलर बन गया था, सौरव गांगुली ने 11 जनवरी 1992 को ब्रिसबेन में वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे मैच से अपने इंटरनेशनल करियर की शुरुआत की थी, पहले मैच में वो सिर्फ तीन रन ही बना पाये थे, उसके बाद उन्हें टीम से ड्रॉप कर दिया गया, करीब पांच साल 26 मई 1996 को मैनचेस्टर में खेले गये इंग्लैंड के खिलाफ वनडे मैच से उनकी वापसी हुई।

ऑस्ट्रेलिया दौरा
गौरव कपूर ने दादा से 1992 में ऑस्ट्रेलिया के पहले टूर की कहानी पूछी, तो गांगुली ने कहा चांस भी नहीं मिला और मुश्किल भी बहुत था, थोड़ा सा समय लगता है अभ्यस्त होने में, वो ऑस्ट्रेलिया अलग ऑस्ट्रेलिया था, sourav ganguly1पेस, बाउंस और इंडिया तब बाहर जाकर अच्छा नहीं खेलता था, क्योंकि इतना बार-बार खेलने नहीं जाते थे, मुझे याद है कि हम ऑस्ट्रेलिया में 1991 के आखिर में गये थे, इसके बाद अगली बार 1999 में गये, 8 साल बाद।

17 साल का था
गांगुली ने कहा, तब 17 साल का था, मेरा गेम बना भी नहीं उसके लिये, तो फिर लौट लिये घर, कोई समस्या नहीं, जाकर फर्स्ट क्लास खेलते रहे, मजा आता था, हमारी टीम बहुत बढिया थी, गौरव ने बीच में टोकते हुए पूछा, बॉलिंग मशीन भी लगाई थी घर में, तो दादा ने कहा, पिताजी ने सबकुछ लगाया था, बेटे के लिये जिम, बॉलिंग मशीन, प्रैक्टिस पिचेस, घर में प्रैक्टिस पिचेस थीं, दो नेट लगे हुए थे, एक सीमेंट और एक टर्फ।

नेट बॉलर बन गया
सौरव गांगुली ने कहा, बस यही था कि खेलते रहो, मैं तो नेट बॉलर बन गया था, सेलेक्ट हुए थे बल्लेबाज के तौर पर और बन गये थे गेंदबाज, एक समय ऐसा था कि ड्रेसिंग रुम से सिर्फ बूट ही उठाकर लाता था, बाकी सबकुछ पड़ा रहता था, क्योंकि पता था कि मौका तो मिलेगा नहीं, इसको उठाओ और शुरु से अंत तक बॉलिंग ही करते रहो, मुझे बॉलिंग करना अच्छा लगता था, शायद इसी कारण बॉलिंग इम्प्रूव भी हुई, प्रैक्टिस करते गये, आइडिया होता गया।

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