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Monday, February 8, 2021

PM मोदी ने अपनी भतीजी का टिकट काटा, वंशवाद को बढ़ावा दे रहे भाजपाईयों के लिए ये बड़ी सीख है


 बदलाव की शुरुआत खुद से करना हमेशा ही किसी नेतृत्वकर्ता के लिए सकारात्मक होता है, और ये बात देश के प्रधानमंत्री और आज के दौर में बीजेपी के सर्वोच्च नेता नरेंद्र मोदी भी अच्छी तरह जानते है। वंशवाद की वो हमेशा ही खिलाफत करते रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी के अन्य कई नेताओं की अगली पीढ़ी का आसानी से पार्टी में सफ़लता प्राप्त करना पीएम मोदी और देश‌ के गृहमंत्री अमित शाह के लिए मुसीबत बनता रहा है। ऐसे में बीजेपी के गुजरात आलाकमान ने पीएम मोदी की भतीजी को पार्षद का टिकट न देकर एक सांकेतिक सीख दी है कि पार्टी के अन्य नेताओं को भी अब इस मुद्दे पर गहनता से सोचना चाहिए।

राजनीतिक पार्टी जब सत्ता में होती है तो उसका विस्तार भी तेजी से होता है। ऐसे में पार्टी के प्रमुख नेताओं को तो महत्त्व मिलता ही है, बल्कि उनके घर की अगली पीढ़ी के  युवा भी राजनीति में आसानी से स्थापित हो जाते हैं। आज की स्थिति में बीजेपी के साथ भी यही हो रहा है। बीजेपी में भी ऐसे नेताओं की फौज है, जिनके बच्चों को विरासत में राजनीति मिल गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर कैलाश विजयवर्गीय, वसुंधरा राजे सिंधिया, स्वामी प्रसाद मौर्य, कल्याण सिंह, गोपीनाथ मुंडे, प्रमोद महाजन, हुकुमदेव नारायण सिंह यादव, मेनका गांधी, प्रेम कुमार धूमल और बृजभूषण शरण सिंह जैसे कई वरिष्ठ नाम हैं जिनके रसूख के कारण उनके अगली पीढ़ी के बेटे एवं बेटियां आसानी से राजनीति में स्थापित हो गए हैं और इससे बीजेपी में भी वंशवाद की जड़ें गहरी होती चलीं गईं।

बीजेपी लगातार कांग्रेस समेत, सपा, टीएमसी, आरजेडी, एनसीपी पर वंशवाद की राजनीति का आरोप लगाती रही है जो कि सही भी है, लेकिन अब विपक्षी भी बीजेपी पर ही उसके वरिष्ठ नेताओं के नाम गिनाकर आरोप लगाते हैं कि बीजेपी भी दूध की धुली नहीं रही है क्योंकि वंशवाद ने वहां भी अपनी जड़ें मजबूत कर रखी हैं। ऐसे में बीजेपी के चाणक्य अमित शाह और नरेंद्र मोदी भी इस सवाल की काट करने के लिए पार्टी के अन्य अनेक बिंदु को तो गिनाते हैं, लेकिन असल बात वहीं आकर फंस जाती है कि  ये भी तो वंशवाद ही है।

इन वंशवाद के गहरे होते दाग के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन्म भूमि से एक तगड़ा सांकेतिक संदेश आया है जहां पीएम मोदी की भतीजी सोनल मोदी को अहमदाबाद की एक सीट से पार्षद पद का टिकट नहीं दिया गया। वो ये कहती रहीं कि वंशवाद के आधार पर नहीं बल्कि कार्यकर्ता के आधार पर टिकट मिले लेकिन उन्हें नकारात्मक ज़वाब ही मिले। इस मुद्दे पर जब गुजरात  बीजेपी अध्यक्ष सी आर पाटिल से सवाल पूछा गया तो उन्होंने साफ कह दिया कि नियम सभी के लिए बराबर हैं, चाहे वो कोई भी क्यों न हो।

दरअसल बीजेपी ने गुजरात निकाय चुनाव को लेकर टिकट बंटवारे के नियम में बड़ा बदलाव किया है। इसके तहत यदि किसी के परिवार का कोई भी सदस्य पार्टी में उच्च पद पर है तो उसे टिकट नहीं मिलेगा। इसी तरह 60 साल की उम्र से ज्यादा वाले लोगों को और तीन बार पार्षदी का चुनाव जीत चुके लोगों को भी अब चुनाव का टिकट नहीं दिया जाएगा, इसको देखते ही स्थानीय स्तर पर खूब विरोध पार्टी के अंदरखाने में भी हो रहा है लेकिन पार्टी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। टिकट बंटवारे को लेकर बना ये नया नियम देखने में भले ही छोटा है लेकिन दिलचस्प बात ये है कि ये गुजरात में लागू हो गया है। बीजेपी के लिए गुजरात उसकी किसी भी नए कार्य की शुरुआत के लिए प्रयोगशाला के रूप में जाना जाता है। इसलिए इस नियम को एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर देखा जा रहा है। इसके सफल होने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं जिसका उद्देश्य एक वंशवाद रहित युवा राजनीतिक पीढ़ी को आगे बढ़ाना  है।

इसी के तहत अपनी जन्मभूमि में भतीजी को पार्टी का टिकट न दिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी ही पार्टी के उन सभी नेताओं को एक सख्त सांकेतिक संदेश दिया है जो कि वंशवाद के कारण पार्टी के लिए मुसीबत का सबब बनते हैं। पीएम उन सभी को बता रहे हैं कि उनकी ही तरह ही अब पार्टी के अन्य नेताओं को भी अपने बच्चों या सगे संबंधियों को राजनीति में स्थापित करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे पार्टी की गरिमा गिरती है।

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