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Tuesday, February 9, 2021

जानकारी: क्या होते हैं ग्लेशियर और कैसे बनते हैं, इनके टूटने से क्यों मचती है तबाही?

 

जानकारी: क्या होते हैं ग्लेशियर और कैसे बनते हैं, इनके टूटने से क्यों मचती है तबाही?

उत्तराखंड के चमोली जिले में रविवार सुबह 10 बजे के करीब अचानक एक ग्लेशियर टूटकर धौली नदी में गिर गया, जिसके बाद बाढ़ जैसे हालात बन गए । तेजी से एक सैलाब सा उमड़ने लगा, तपोवन इलाके के रेनी गांव में हिमस्खलन की वजह से धौली नदी का जल स्तर तेजी से बढ़ गया और इसके बाद प्रकृति का कहर पूरे इलाके में जमकर बरसा । लेकिन राहत की बात ये कि तबाही कुछ इलाकों में ही सिमट गई । लेकिन नुकसान व्‍यापक हुआ है । आइए जानते हैं कि आखिर ये ग्‍लेशियर्स क्‍या हैं, कैसे बनते हैं और इनके टूटने से कैसे तबाही हो जाती है ।

ग्लेशियर क्‍या होते हैं …
Glacier, ग्‍लेशियर को हिंदी में हिमनद कहा जाता है । यानी बर्फ की एक ऐसी नदी, जिसका पानी ठंड के कारण जम जाता है । ग्‍लेशियर्स जब टूटते हैं तो स्थिति काफी गंभीर हो जाती है । वजह ये है कि जमा हुआ बर्फ ही पिघलकर पानी बनता है और आसपास के क्षेत्र की नदियों में समाकर उनका जलस्तर तेजी से बढ़ा देता है । ग्‍लेशियर्स पहाड़ी क्षेत्र में ही होते हैं, इसी वजह से इनका पानी का बहाव बहुत तेज होता है । जब ये टूटते हैं और बहाव में आगे बढ़ते हैं तो रास्ते में पड़ने वाली हर चीज को तबाह करते हुए आगे बढ़ती है ।

ग्लेशियर के प्रकार
हिमनद दो तरह के होते हैं, एक अल्पाइन ग्लेशियर या घाटी दूसरा होता है   ग्लेशियर का पहाड़ । उत्तराखंड के चमोली में जो घटना हुई वो पहाड़ी ग्लेशियर के कारण हुई । यही सबसे ज्‍यादा खतरनाक भी माने जाते हैं । ग्लेशियर उन्‍हीं जगहों पर बनते हैं जहां काफी ठंड होती है और हर साल बर्फ जमा होती रहती है । ठंड में फिर से बर्फबारी होने पर पहले से जमीं बर्फ दबने लगती है, इसका  घनत्व बढ़ता ही जाता है । इस अवस्‍था में बर्फ के हल्के​ क्रिस्टल ठोस बर्फ के गोले यानी ग्लेशियर में बदलने लगते हैं । बर्फ की कई परतों के कारण ये और कठोर होते जाते हैं । धीरे – धीरे कर कई सालों में ये विशाल रूप धारण कर लेते हैं । कई बार बर्फबारी के कारण पड़ने वाले दबाव से ही ये बिना अधिक तापमान के ही पिघलने लगती है और बहने लगते हैं, हिमनद तब तक खतरनाक नहीं होते जब तक यह हिमस्खलन में तब्दील न हो जाएं । ग्लेशियर का पानी के साथ मिलना इसे और ज्यादा विनाशक बना देता है। पानी के साथ मिलते ही ग्लेशियर टाइडवॉटर ग्लेशियर बन जाते हैं । जिससे नदी के पानी का बहाव और स्तर बढ़ जाता है । चमोली की धौली नदी में भी यही नजारा दिखा।

पानी के सबसे बड़े स्रोत
ग्लेशियर पृथ्वी पर पानी के सबसे बड़े सोर्स माने जाते हैं, नदियों में पूरे साल जो पानी रहता है वो इन्‍हीं ग्‍लेशियर का होता है । गंगा नदी का स्रोत गंगोत्री भी एक हिमनद ही है । ऐसे ही यमुना नदी का स्रोत यमुनोत्री भी ग्लेशियर ही है । लेकिन ग्लेशियर का टूटना या पिघलना ऐसी दुर्घटनाओं का कारण बनता है जो एक बड़ी आबादी पर असर डालता है । दरअसल ग्लेशियर हमेशा अस्थिर होते हैं, ये धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकते रहते हैं । इसी प्रकिया के दौरान कई बार ये टूटकर गिरने लगते हैं । और अपने साथ बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े लेकर आगे बढ़ने लगते हैं । भूकंप की स्थिति में भी चोटियों पर जमी बर्फ ​खिसककर नीचे आने लगती है, जिसे एवलॉन्च कहते हैं ।

क्‍यों पिघल रहे हैं ग्‍लेशियर्स?
ग्‍लेशियर्स के पिघलने का सबसे बड़ा कारण है ग्लोबल वॉर्मिंग, यानी बढ़ता मापतान । जिसकी वजह से अंटार्कटिका के ग्लेशियर पिघल रहे हैं । विशेषज्ञों के अनुसार अंटार्कटिका का थ्वाइट्स ग्लेशियर जो आकार में ब्रिटेन के क्षेत्रफल से भी बड़ा है वो तेजी से पिघल रहा है । सालाना इसके कारण 35 अरब टन पानी पिघलकर समुद्र में जा रहा है । साल 2100 तक यहां समुद्र के किनारे पर बसे देश, शहर, गांवों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है । ग्लेशियर के पिघलने की वजह कार्बन डाई ऑक्साइड और ग्रीनहाउस गैसों के काफी ज्यादा मात्रा में उत्सर्जन है । कारखाने, व्हीकल, एसी, फ्रिज सभी इन गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं, जिसकी वजह से धरती का तापमान बढ़ रहा है । कार्बन समेत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए ही कई देश अब क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें सोलर एनर्जी, विंड टरबाइन, एटॉमिक एनर्जी आदि शामिल हैं ।

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