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Wednesday, January 27, 2021

दुनिया को ताइवान के पक्ष में आना चाहिए, बाइडन के सत्ता में आते ही ताइवान पर कब्जा करना चाहता है चीन

 


अमेरिका में सत्ता बदलते ही चीन एक बार फिर से आक्रामक होने लगा है। अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन के चीन के प्रति ढुलमूल रवैये के कारण अब वह एक बार फिर से गुंडागर्दी शुरू कर चुका है जिसका असर हमें ताईवान के ऊपर देखने को मिल रहा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार चीन एक बार फिर से विश्व के नेताओं को ताइवान से संबंध न बढ़ाने की चेतावनी दे रहा है, इससे न सिर्फ ताइवान को नुकसान होगा बल्कि यह विश्व के सामने भी एक गंभीर चुनौती पैदा कर सकता है। जब चीन ने ताइवान के विश्व से बढ़ते संबंध को नियंत्रित करना शुरू किया तो विश्व के नेताओं को यह समझ आया है कि कैसे ताइवान तकनीकी के क्षेत्र में खास कर सेमीकंडक्टर चिप उत्पादन की सप्लाई चेन के लिए महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि विश्व के लोकतान्त्रिक देशों को खास कर जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया और फ़्रांस को मिल कर ताइवान की संप्रभुता बचाने की योजना पर काम करना चाहिए।

दरअसल, जब तक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप थे तब तक चीन के प्रति आक्रामक रुख बनाए हुए थे और ताइवान की मदद करते रहे थे। तब तक तो चीन ताइवान के अन्य देशों के साथ बढ़ते संबध को सहता रहा। परन्तु जैसे ही अमेरिका में सत्ता परिवर्तन हुआ और चीन के प्रति नरम रुख रखने वाले जो बाइडन के आते ही चीन एक बार फिर से ताइवान पर अपनी काली नजर गड़ा दी है।

ट्रम्प प्रशासन ने सेमी कंडक्टर पर प्रतिबन्ध लगा कर बीजिंग की तकनीक तक पहुंच को ही रोक दिया था। डिजाइन सहित सभी अमेरिकी चिप प्रौद्योगिकी तक पहुंच पर प्रतिबंध तो लगाया ही, साथ में ताइवान की सबसे बड़ी चिप निर्माता टीएसएमसी और अन्य फाउंड्री से सेमी कंडक्टर की आपूर्ति भी रोक दी थी।

अब वह जिस तरह से चीन ताइवान पर नियंत्रण करने की चाल चल रहा है उससे कई सवाल खड़े हो गए हैं। अगर चीन ताइवान पर आक्रमण करने की धमकी को वास्तविकता में बदलता है तो TSMC यानि Taiwan Semiconductor Manufacturing Company की चिप फैक्ट्रियों को सबसे पहले नुकसान हो सकता है। TSMC जिस तरह से अपने बिजनेस बढ़ा चुका है और इस वर्ष के लिए 28 बिलियन डॉलर के पूंजीगत व्यय करने जा रहा है, उससे पता चलता है कि किसी भी चीनी आक्रामक नीति का शिकार सबसे पहले वही होगा। ताइवान चीनी सुरक्षा नीति के लिए एक गंभीर मुद्दा है और चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। ऐसे में वह किसी को भी नहीं छोड़ने वाला।

पेरिस के Institute Montaigne में एशिया कार्यक्रम के निदेशक Mathieu Duchatel का कहना है कि, “अभी तक जबकि वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला में ताइवान की स्थिति का एक बड़ा “रणनीतिक महत्व” है। मोबाइल फोन की कंपनियों जैसे एप्पल से लेकर, कार मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों जैसे जर्मनी की Volkswagen AG, अमेरिका की Ford Motor Co. और जापान की Toyota Motor Corp भी इस छोटे से देश ताइवान पर सेमीकंडक्टर चिप के लिए निर्भर हैं। TSMC विश्व की सबसे बड़ी Fonudry मैन्युफैक्चरर है। ताइवान के इसी महत्व को देखते हुए यह स्पष्ट है कि अगर चीन ताइवान पर नियंत्रण कर लेता है तो वह सेमीकंडक्टर चिप के सप्लाई चेन पर भी नियंत्रण कर लेगा और यह विश्व के लिए एक चोक पॉइंट बन जायेगा।

शायद यही वजह है कि अमेरिका से ले कर जापान और EU के फ़्रांस और जर्मनी चिप मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भर होना चाहते हैं।

परन्तु अगर चीन ताइवान पर आक्रमण कर नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगा तो उसे TSMC तथा अन्य चिप मैन्युफैक्चरिंग के एक्सपोर्ट पर नियंत्रण हो जायेगा साथ ही सरकारी हस्तक्षेप के कारण, अचानक वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधान आना तय है। ऐसे में विश्व के अन्य लोकतान्त्रिक देशों खास कर इंडो पैसिफिक के देश जैसे भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहे फ़्रांस को तुरंत योजनाबद्ध तरीके से चीन के बढ़ते कदम को रोकना चाहिए। इससे न सिर्फ सेमीकंडक्टर की सप्लाई चेन को बचाया जा सकेगा बल्कि एक लोकतान्त्रिक देश की रक्षा होगी। अब यह देखना है कि ये देश अमेरिका की गैरमौजूदगी में चीन का मुकाबला कैसे करते हैं।

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