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Saturday, December 12, 2020

चीन RCEP और ऑस्ट्रेलिया पर लगाए प्रतिबंधों को अपनी जीत मान रहा था, फिर भारत आया और चीन दोबारा सदमे में गया


ऑस्ट्रेलिया के साथ चीन की वुल्फ़ वॉरियर कूटनीति और भारत के साथ सीमा तनाव के साथ महामारी के अभूतपूर्व प्रसार ने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सिर्फ रणनीतिक साझेदारी को ही मजबूत नहीं किया है बल्कि व्यापारिक संबंध भी मजबूत किया है। रिपोर्ट के अनुसार अब भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की बातचीत ने रफ्तार पकड़ ली है।

SCMP की रिपोर्ट के अनुसार ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते के लिए अब नई दिल्ली के शीर्ष राजनयिकों से समझौते के लिए हरी झंडी मिल चुकी है। चीन की आक्रामकता और व्यापार में ऑस्ट्रेलिया के साथ जबरदस्ती ने इस ट्रेड डील के लिए मजबूर किया है।

भारत के विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने भी इस सप्ताह एक संभावित व्यापार समझौते पर बातचीत की पुष्टि भी की, जो नई दिल्ली के क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी यानि RCEP से बाहर निकलने के बाद इस कदम को उठाया गया। विदेश मंत्री जयशंकर ने ऑस्ट्रेलिया स्थित लोवी संस्थान द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बुधवार को कहा, “एक मुक्त व्यापार समझौते यानि एक द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते पर एक चर्चा हो रही है, क्योंकि आप जानते हैं, हमने RCEP पर हस्ताक्षर नहीं किया है।“

भारत के पिछले वर्ष नवंबर में RCEP से हाथ खींच लेने के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि कहीं भी ऐसा मंच जहां शर्ते बीजिंग के पक्ष में है, वहाँ भारत अपनी सहमति नहीं देने वाला है। उसके बाद भारत ने RCEP में शामिल देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार सम्बन्धों को बढ़ाने पर ज़ोर दिया है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के बढ़ते व्यापारिक समबंधों को एक नई ऊंचाई देने के लिए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की वास्तविकता अधिक दूर नहीं थी।

हालांकि, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच इस प्रकार के समझौते पर एक दशक पहले ही वार्ता शुरू हुई थी परंतु इसी वर्ष जून में प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन और नरेंद्र मोदी ने वार्ता को फिर से शुरू करने पर सहमति व्यक्त की थी। जून में, मॉरिसन और मोदी ने एक “व्यापक रणनीतिक साझेदारी” शुरू करने की घोषणा की, जिसने रक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और व्यापार सहित क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया।

चीन द्वारा ऑस्ट्रेलिया पर लगातार आर्थिक हमले करने पर भारत ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया था। हाल के महीनों में ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों ही चीन के साथ बड़े विवादों में रहे हैं। कैनबरा ने सार्वजनिक रूप से Covid -19 महामारी की अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की थी जिसके बाद बीजिंग ने अरबों डॉलर के ऑस्ट्रेलियाई निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया था। वहीं चीन ने भारत के साथ बॉर्डर पर तनाव भी बढ़ाया हुआ है। चीन ने तो गलवान घाटी में भारतीय सनिकों पर पीछे से हमला भी कर दिया था जिसके बाद भारतीय सैनिकों ने भी जम कर चीनी सैनिकों की कुटाई की थी।

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच इस मुक्त व्यापार समझौते के बाद सबसे अधिक नुकसान चीन को होने वाला है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत के RCEP से बाहर निकलने के बाद ऑस्ट्रेलियाई नीति निर्माताओं ने चीन के प्रतिबंधों को देखते हुए व्यापार में विविधता लाने की आवश्यकता को मान्यता दी। चीन अब तक ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जो सभी निर्यात का लगभग 40 प्रतिशत लेता है। वहीं भारत के विदेश विभाग और व्यापार विभाग के अनुसार ऑस्ट्रेलिया का भारत के साथ दोतरफा व्यापार 2007 में 13.6 बिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर से बढ़कर 2018 में  30.4 बिलियन  ऑस्ट्रेलियन डॉलर हो चुका है। अब अगर यह समझौता हो जाता है तो ऑस्ट्रेलिया की चीन पर से निर्यात के लिए निर्भरता कम होगी

एडिलेड विश्वविद्यालय में एशियाई अध्ययन के प्रोफेसर पूर्णेंद्र जैन ने चीन को इन दोनों देशों के गहरे संबंधों में एक “उत्प्रेरक” बताया। जैन ने कहा, “इस समझौते के बाद ऑस्ट्रेलिया के व्यापार के लिए विविधीकरण की कुछ संभावना के साथ और अधिक आश्वस्त भागीदार” बनेगा।

चीन ने भारत के RCEP से बाहर होने और ऑस्ट्रेलिया पर टैरिफ वार कर यह सोचा था कि उसने दोनों देशों को व्यापार में मात दे दी है, लेकिन भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के बाद उसे एक बड़ा झटका लगने वाला है।

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