रूस को ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं, NATO Divide खुद ही बन रहा है तुर्की के लिए गले की हड्डी

 


पिछले कुछ महीनों के जियोपॉलिटिक्स को देखा जाए तो कई घटनाएँ हुई जिनमें अज़रबैजान का आर्मेनिया के साथ युद्ध भी शामिल हैं। इस युद्ध में तुर्की ने अज़रबैजान का खुल कर साथ दिया लेकिन आर्मेनिया के साथ मिलिटरी सम्बन्धों के बावजूद रूस ने किसी प्रकार से प्रत्यक्ष मदद नहीं की।

तब यह कहा जा रहा था कि रूस अपने हथियारों की बिक्री के कारण तुर्की पर कोई कार्रवाई नहीं करना चाहता है और अज़रबैजान में तुर्की का प्रभुत्व बढ़ने देना चाहता है।

हालांकि यहाँ रूस का तुर्की के लिए नरम व्यवहार कुछ और नहीं बल्कि राष्ट्रपति पुतिन की एक चाल है जो उन्होंने इस NATO के सदस्य के खिलाफ चली है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज के समय में तुर्की NATO का सबसे बिगड़ैल सदस्य है, और अपनी हालिया हरकतों से उसने न सिर्फ EU बल्कि अमेरिका को भी नाराज किया है जिससे अब दोनों ताक़तें तुर्की पर sanctions लगाना चाहती है।

अब इसी नाराजगी का फायदा पुतिन उठाना चाहते हैं, कि कैसे भी तुर्की पर प्रतिबंधों की झड़ी लग जाए जिसके बाद अज़रबैजान जैसे देशों से उसका प्रभुत्व अपने आप समाप्त हो जाएगा। जब तुर्की ने अज़रबैजान का साथ देना शुरू किया और यहाँ तक कि रूस को पीछे धकेलने के लिए ड्रोन सहित अपने लड़ाकों को भी भेज दिया था तब इस आक्रामकता के बावजूद रूस ने अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच शांति समझौता करवाया।

क्रेमलिन नेता व्लादिमीर पुतिन अपने पूर्व सोवियत क्षेत्र में घुसपैठ पर नाराज तो थे लेकिन वह इस नाराजगी को दिखा नहीं रहे थे। यह एर्दोगन की पहली चुनौती थी जिसे आम तौर पर आक्रामक रहने वाले पुतिन ने सहन किया है।उन्हें यह विश्वास था कि तुर्की अपने साथी नाटो सदस्यों के लिए एक कांटा बना हुआ है, जो तुर्की के साथ उनके सम्बन्धों को और बिगाड़ेगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तुर्की के रूसी एस -400 मिसाइल-रक्षा प्रणाली की खरीद पर तुर्की के खिलाफ कई योजनाओं को मंजूरी दे दी है, जो एर्दोगन के प्रयासों को और अधिक जटिल बनाएगी।अजरबैजान से लेकर सीरिया और लीबिया तक, तुर्की एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कई मौकों पर रूस की महत्वाकांक्षाओं को चुनौती देता नजर आया है। यहां तक ​​कि एर्दोगन ने क्रेमलिनप्रभाव वाले क्षेत्रों पर भी खुद को तेजी से आगे बढ़ाया।

रूसी सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ब्लूमबर्ग से कहा कि, “तुर्की और अमेरिका तथा यूरोप के बीच कई अंतर हैं जिससे इनके सम्बन्धों में खटास बनी रहेगी। एर्दोगन किसी अन्य की नहीं सुनेंगे की उन्हें कैसे व्यवहार करना है।”

बता दें कि EU भी लगातार तुर्की के खिलाफ प्रतिबंधों की बात कर रहा है। यूरोपीय संघ के नेताओं ने साइप्रस जल क्षेत्र में गैस ड्रिलिंग में शामिल तुर्की अधिकारियों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने के लिए सहमति व्यक्त की है, हालांकि अभी उन्होंने व्यापार के टैरिफ या एक हथियार निषेध जैसे बड़े फैसलों को तब तक के लिए टाल दिया जब तक कि वे अमेरिका के बाइडेन प्रशासन के साथ परामर्श नहीं कर लेते।

वहीं रूसी रक्षा प्रणाली की खरीद के मामले में तुर्की पर प्रतिबंध लगाने को अमेरिका भी तैयार है। Reuters के अनुसार एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी प्रशासन द्वारा कुछ ही दिनों में इसकी घोषणा की जाएगी। पिछले ही साल घोषणा की गई थी कि अंकारा के फैसले के कारण उसे अमेरिका के F-35 फाइटर जेट प्रोग्राम से हटाया जा रहा है। इसने तुर्की की 100 से अधिक विमानों की खरीद की योजना को भी अवरुद्ध कर दिया है।

वहीं अमेरिका के अगले राष्ट्रपति जो बिडेन ने भी एर्दोगन की आलोचना की और कहा कि अमेरिका को एर्दोगन के राजनीतिक विरोधियों का समर्थन करना चाहिए। यानि आने वाले समय में भी तुर्की और अमेरिका के सम्बन्धों में सुधार होने की उम्मीद नहीं दिख रहा है जो पुतिन चाहते हैं। वहीं एक अन्य NATO सदस्य फ्रांस भी तुर्की के साथ कई मोर्चों पर विवाद में है।

इन सभी के तुर्की के साथ खराब सम्बन्धों को ही देख कर रूसी राष्ट्रपति पुतिन किसी प्रकार से आक्रामकता दिखाने से बचे। अगर NATO आपस में ही लड़ता है तो पुतिन कई मामलों में इसका लाभ ले सकते है ।

पहले तो ये कि बाकी देश रूस के पास मदद के लिए आएंगे और साथ में तुर्की का बढ़ता प्रभुत्व अपने आप समाप्त हो जाएगा जिससे पूर्व सोवियत देशों पर फिर से रूस अपना कब्जा कर लेगा। यही कारण है कि पुतिन अभी तुर्की के खिलाफ एक नरम रुख अपनाए हुए हैं।

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