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Tuesday, December 1, 2020

बेलारूस के बाद Moldova बना यूरोप और रूस के बीच तनाव का कारण

 


एक के बाद एक कर पूर्वी यूरोप से देश रूस के प्रभाव से दूर होकर EU के पाले में जा रहे हैं। पहले बेलारूस में रूस विरोधी प्रदर्शन हुए और अब Moldova के चुनाव परिणाम में रूस समर्थित नेता को हार मिली है जिससे न सिर्फ रूस क्षेत्रीय प्रभुत्व खतरे में पड़ेगा, बल्कि इन पूर्व सोवियत देशों के EU में शामिल होने के आसार भी बढ़ जाएंगे। Moldova के चुनावों में पश्चिम समर्थिन नेता Maia Sandu की जीत के बाद अब ऐसा लगता है कि यह छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश बेलारूस के बाद EU और रूस के बीच तनाव का सबसे बड़ा कारण बनेगा।

दरअसल, Moldova पूर्वी यूरोप में यूक्रेन और रोमानिया से घिरा एक छोटा सा देश है जो सोवियत संघ के टूटने के बाद आजाद हुआ था। इसी वर्ष 15 नवंबर को राष्ट्रपति चुनावों के दूसरे दौर को सम्पन्न कराया गया था जिसमें मतदाताओं ने रूस समर्थक राष्ट्रपति Igor Dodon को सत्ता से बाहर करते हुए हार्वर्ड शिक्षित पूर्व प्रधानमंत्री Maia Sandu को चुना था।

Maia Sandu, 3.5 मिलियन जनसंख्या वाले इस पूर्व सोवियत गणराज्य की पहली महिला राष्ट्रपति बनेंगी। Sandu के चुनाव जीतने के बाद वहां की जियोपॉलिटिक्स में एक भारी बदलाव आना तय है। एक तरह से वे अमेरिका तथा EU समर्थक हैं, तो वहीं, रूस अपने प्रभुत्व को कम होता देख किसी न किसी प्रकार से अपनी पकड़ को कम नहीं होने देगा। Sandu के चुनाव जीतने के बाद Moldova संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ EU और रोमानिया के पक्ष में झुकने के आसार अधिक है। उदाहरण के लिए, रोमानियाई राष्ट्रपति Klaus Iohannis ने पहले ही Sandu के जीत की खबर मिलते ही आधिकारिक यात्रा करने की घोषणा कर दी थी।

Sandu के आने से रूस न तो घरेलू और न ही विदेश नीति को प्रभावित कर पाएगा हालांकि, नए राष्ट्रपति ने रूस के साथ भी सम्बन्धों को सुधारने की बात कही है। Moldova के चुनाव में रूस ने मौजूदा राष्ट्रपति को जिताने के लिए सभी प्रयास कर लिए थे, चाहे वो मीडिया को प्रभावित करना हो यह संस्थानों को लेकिन जनता अब रूस के चंगुल से निकलने के मूड में थी। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने Mandu को जीत के बाद बधाई दी, लेकिन वह उसकी सफलता से स्तब्ध थे।

रूस का Moldova में अभी भी प्रभाव रहने ही वाला है, क्योंकि मॉस्को Transnistria के टूटने वाले क्षेत्र को अपने सैनिकों द्वारा नियंत्रित करता है, जिसने 1992 में Moldova से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की थी। इस क्षेत्र के साथ स्पष्ट रूप से एक रणनीतिक कार्ड शेष है जिसे क्रेमलिन आवश्यकता पड़ने पर खेल सकता है। यही नहीं Gagauzia क्षेत्र पर भी रूस का प्रभाव अधिक है। यही कारण है कि कुछ विश्लेषक यह अनुमान लगा रहे हैं कि रूस अप्रत्याशित कदम भी उठा सकता है। जॉर्जिया, यूक्रेन और बाल्टिक देशों जैसे पड़ोसियों ने हाल के वर्षों में पश्चिम के साथ अपने सम्बन्धों को मजबूत किया है तो वहीं, बेलारूस और अब Moldova में सत्ता परिवर्तन रूस को नाराज करने के लिए काफी है।

परंतु यूरोपियन यूनियन भी इस छोटे से महत्वपूर्ण देश को अपनी तरफ करने का पूरा इंतजाम करके बैठा है। अगर Moldova का एकीकरण यूरोपीय संघ में होता है तो यह ब्रुसेल्स की सॉफ्ट पावर की जीत होगी वह भी ब्रेक्जिट के बाद। परंतु यह सौदा EU के लिए महंगा होगा और यूरोपीय संघ को Chisinau में काफी बड़ा निवेश करना होगा।

कुछ ही दिनों पहले 26 नवंबर को Council Of Europe के 47 सदस्यीय देशों का प्रतिनिधित्व करने वाली मंत्रियों की समिति ने वर्ष 2021-2024 के लिए Moldova गणराज्य के लिए नयी कार्य योजना को अपनाया है, जिसका उद्देश्य देश के कानून, संस्थानों को यूरोपीय मानकों के अनुरूप लाना है।

अगर देखा जाए तो Moldova पश्चिम और रूस के बीच तनाव के केंद्रों में से एक होने वाला है। एक तरफ यूरोपीय संघ और नाटो के लिए, हाल के चुनावों के परिणाम पक्ष में है, जिससे वह अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करेंगे लेकिन दूसरी तरफ ट्रांसनिस्ट्रिया और गागुज़िया में रूसी प्रभुत्व EU के महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में बाधा डालेंगे।

वहीं, रोमानिया भी इस तनाव में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है क्योंकि वह भी Moldova को रोमानिया में मिला कर एकीकरण करना चाहता है लेकिन उसे भी Bucharest और Chisinau के बीच की दूरी को ध्यान में रखना होगा। वास्तविकता यही है कि ग्रेटर रोमानिया के पुनर्जन्म की संभावना न के बराबर ही है। रूस Moldova में अपने प्रभाव को और बढ़ाने के लिए उसे रणनीतिक रूप से EEU और CSTO में शामिल करना चाहेगा। अब देखना यही है कि किस पक्ष को आखिर में सफलता मिलती है।

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