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Wednesday, December 2, 2020

“चीन के BRI को छोड़ दो”, SCO समिट में मध्य एशियाई देशों को भारत ने साफ संदेश दे दिया है


भारत ने सोमवार को एक बार फिर से अपने रुख को दोहराते हुए, शंघाई सहयोग संगठन यानि SCO के शिखर सम्मेलन में चीन की मेगा कनेक्टिविटी परियोजना OBOR या वन बेल्ट वन रोड पहल को समर्थन देने से इनकार कर दिया। भारत ने चीन का विरोध कर अन्य सदस्य देशों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि चीन की यह परियोजना ऋण जाल की नींव तैयार करती है जिसमें छोटे देश फंस जाते हैं।

नई दिल्ली ने हमेशा से ही BRI का विरोध इसलिए भी किया है क्योंकि BRI का ही एक हिस्सा CPEC पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से होकर गुजरता है जो भारत के संप्रभुता के खिलाफ है।

इस आठ सदस्यीय संगठन में भारत एकमात्र देश था, जिसने BRI परियोजना का समर्थन करने से इनकार कर दिया।

रिपोर्ट के अनुसार BRI या “वन बेल्ट, वन रोड” पहल, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के व्यापार और कनेक्टिविटी के लिए प्रमुख परियोजनाओं में से एक है जिसका कजाकिस्तान, किर्गिज़ गणराज्य, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उजबेकिस्तान ने समर्थन किया। SCO परिषद के अंत में जारी एक संयुक्त विज्ञप्ति कहा गया कि, “कजाकिस्तान गणराज्य, किर्गिज गणराज्य, इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान, रूसी संघ, ताजिकिस्तान गणराज्य और उजबेकिस्तान गणराज्य ने चीन के वन बेल्ट वन रोड ‘(OBOR) पहल की समर्थन की पुष्टि की ।”

पिछली SCO बैठक में भी भारत ने OBOR का समर्थन करने से मना कर दिया था। बता दें कि वन बेल्ट वन रोड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा CPEC या चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा है, जो PoK यानि पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरता है। नई दिल्ली ने कई बार बीजिंग के OBOR पर क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करने का अरोप लगाया है। यही नहीं नई दिल्ली ने विभिन्न मंचों पर, इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि कनेक्टिविटी परियोजनाओं को “खुलेपन, पारदर्शिता और वित्तीय जिम्मेदारी के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।” OBOR ने कई देशों को ऋण के जाल में फंसाया है और ये चीन की Debt Diplomacy का एक अंग है, जिससे इसमें शामिल होने वाले देश चीन के चंगुल में फंस जाते हैं।

इस बैठक में BRI और चीन की Debt Diplomacy पर बात कर भारत ने मध्य एशिया के देशों को स्पष्ट संदेश दिया है कि BRI उनके लिए अच्छा नहीं है। यह चीन की विस्तारवादी नीतियों का एक हिस्सा है और अन्य देशों की क्षेत्रीय संप्रभुता की चिंता नहीं करता है। इसके साथ भारत ने उन देशों को भी यह संदेश देने की कोशिश कि BRI से भी बेहतर विकल्प जैसे INSTC हैं, जिनके साथ वे जुड़कर अपने आप को चीन के चंगुल से बचा सकते हैं।

बता दें कि भारत चीन के BRI को झटका देने के लिए मध्य एशिया में International North-South Transport Corridor (INSTC) पर काम करना चाहता है और इसके लिए पहल भी शुरू हो चुकी है। INSTC अपने रास्ते में पड़ने वाले सभी BRI प्रतिभागियों जैसे अज़रबैजान, आर्मेनिया, मध्य एशियाई गणराज्य, ईरान और यहां तक कि तीन बाल्टिक देशों- लातविया, लिथुआनिया और एस्टोनिया को भी अपने पाले में कर सकता है। इसके अलावा,भारत ने खुले तौर पर उज़्बेकिस्तान को INSTC में आमंत्रित किया है। यानि अब भारत 2002 के भारत, ईरान और रूस द्वारा अनुमोदित अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) संधि को पुनर्जीवित कर रहा है। बता दें कि INSTC हिंद महासागर से चलकर 7,200 किलोमीटर लंबे व्यापार नेटवर्क के लिए एक अनूठा परियोजना मार्ग है। वहीं दूसरी ओर अमेरिका ताइवान के साथ BRI के समानांतर और अधिक किफायती बुनियादी ढांचा विकास मॉडल बनाने पर बातचीत कर रहा है। यह मॉडल दक्षिण अमेरिका तथा एशिया मेंअपनी परियोजनाओं की शुरुआत करेगा। यानि अब अमेरिका भी BRI को चुनौती देने की योजना तैयार कर चुका है।

अब मध्य एशिया के देशों को यह तय करना है कि उन्हें चीन के ऋण में फंस कर अपनी संप्रभुता गंवानी है या फिर भारत जैसे विश्वसनीय सहयोगी के साथ मिलकर विकास के रास्ते पर चलना है।

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