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Tuesday, December 22, 2020

किसान आंदोलन : सेलेब्रिटीज़ के जमावडे़ से खालिस्तानी प्रदर्शन तक


संसद द्वारा पारित कृषि कानूनों को लेकर किसान आंदोलन का रुख धीरे-धीरे बदल चुका है। एमएसपी के मुद्दे से शुरू हुआ ये आंदोलन अब खालिस्तानी समर्थकों की अराजकता तक पहुंच गया है। ये आंदोलन अपनी मूल मांगों के स्वरूप से इतर CAA-NRC जैसे मुद्दों पर बात करने लगा है, इस आंदोलन में प्रधानमंत्री मोदी को मारने की धमकियां दी जा रही हैं, जो दिखाता है कि ये समाज के कुछ खास लोगों द्वारा प्रायोजित है।

अब ये लोग उन किसानों से बात करने की तैयारी कर रहे हैं जो कि इस कृषि कानूनों के समर्थन में हैं जिससे उन्हें भी भड़काया जा सके।

पंजाब से शुरू हुआ तथाकथित किसान आंदोलन हरियाणा होते हुए दिल्ली तक आ गया है। ये लोग लगातार दिल्ली की सीमाओं पर अराजकता का माहौल बनाए हुए हैं। इनके गुटों में खालिस्तानी समर्थकों की एक बड़ी संख्या शामिल है। सरकार लगातार इनसे बातचीत करने का प्रस्ताव दे रही है। जबकि ये लोग केवल और केवल कानूनों को खत्म करने की मांग पर अडिग हैं जो कि बचकानी सोच है। ऐसे में एक बड़ा किसान वर्ग कृषि कानूनों और सरकार के समर्थन मे भी आ गया है जिसके चलते किसानों का आंदोलन कमजोर पड़ने लगा है।

सरकारों को मिल रहे देश के कई किसान संगठनों के समर्थन के बीच अब इन अराजक किसानों को डर लगने लगा है कि कहीं ये आंदोलन ख़तरे में न पड़ जाए। इसलिए ये लोग अब कानून के समर्थक किसानों से मिलकर बात करने की तरकीब अपनाने वाले हैं।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा, “कानूनों का समर्थन करने वाले किसानों की सोच उनकी समझ से परे है। वो उनसे मिलकर उनकी फसल बेचने की तकनीक के बारे में जानेंगे। वे किसानों के पास जाएंगे और उनसे जानेंगे कि आखिर कैसे नए वो कृषि कानूनों से लाभान्वित हुए हैं।”

दिल्ली की सीमाओं पर बैठें इन किसानों ने उत्पात मचा रखा है। इन आंदोलनकारियों के टैंटों में खालिस्तानी समर्थकों के ट्रैक्टर खड़े हैं। आतंकवादी भंडरवाले के समर्थन में पोस्टर लगे हैं। सिख फॉर जस्टिस जैसी अलगाववादी संस्थाएं इनकी फंडिंग कर रही है, जिसकी जांच के लिए गृह मंत्रालय ने आदेश दे दिए हैं। ये बेहद ही दिलचस्प बात है कि किसान आंदोलन में CAA विरोधी लोग बैठें हैं और ये लोग भी शरजील इमाम, उमर खालिद जैसे नेताओं को रिहा करने की बात कर रहे हैं जो दिखाता है कि ये आंदोलन हाईजैक हो चुका है।

किसान आंदोलन में तथाकथित किसान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी मारने की बात कर रहे हैं और “हाय हाय मोदी मर जा तू” जैसे नारे दिन-रात लगाए जा रहे हैं जो दिखाते हैं कि ये आंदोलन बस मोदी विरोध के एजेंडे पर आधारित है। इसीलिए इन लोगों ने पहले देश के कानून समर्थक किसानों से सरकार की बातचीत पर आपत्ति जताई, कानून समर्थक सिख किसानों को समुदाय से बहिष्कार करने की धमकियां दीं, लेकिन जब कोई असर नहीं हुआ तो अब यह लोग उन्हें भड़काने के लिए उनसे बात करना चाहते हैं।

केवल इतना ही नहीं, प्रदर्शनकारियों ने राजस्थान से लेकर पूरे उत्तर भारत में अलग-अलग टोल प्लाजा को फ्री करने की धमकी ही नही दी है बल्कि पंजाब से हरियाणा व दिल्ली की तरफ आने वाले और उत्तर प्रदेश व राजस्थान से दिल्ली की तरफ आने वाले रास्तोॆ के अनेकों टोल नाकों पर अराजकता फैला कर उन्हें बंद कर दिया है। जिससे केन्द्र व राज्य सरकारों को प्रतिदिन एक बड़ी रकम का नुकसान हो रहा है। इन तथाकथित किसानों का ये रवैया अराजकता से लबरेज है औऱ ये एक सभ्य आंदोलन का पर्याय नहीं है।

ये सारे प्रकरण इस बात का संकेत है कि यह आंदोलन पूर्ण रूप से अराजकता की भेंट चढ़ चुका है जिसका किसान है तो से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है यह लोग केवल मोदी सरकार के विरोध में समानान्तर विपक्ष का एजेंडा चला रहे हैं।

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