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Monday, December 21, 2020

“लगदी लाहौर दिया”, अपने देसी पंजाबी गायकों की समस्या दूसरा पंजाब है

 


‘ओ लगदी लाहौर दी आ, जिस हिसाब नाल हसदी आ!’

‘तेरे लक तों लगदा कराची नी, फैन मारे जानिया बुगाटी दी!’ 

ऐसे पंक्ति पढ़कर आप को लग रहा होगा कि कोई पाकिस्तानी गीतकार अपने शहरों के इर्द गिर्द गीत लिख रहा है, लेकिन ये किसी पाकिस्तानी के नहीं, बल्कि भारतीय गीत के बोल हैं, जिसे गुरु रंधावा और हार्डी संधु जैसे भारतीय गायकों ने अपनी आवाज दी है। अब यही पंजाबी गायक दिलजीत दोसांझ की खालिस्तानी तत्वों द्वारा हाईजैक हो चुके किसान आंदोलन पर की गई टिप्पणी से विवाद के घेरे में हैं।

इन दिनों दिल्ली के आसपास ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर जो उग्रवादी और आढ़तियों की टोली ने डेरा जमाया है, उन्हें पंजाब से, और विशेषकर पंजाबी फिल्म एवं संगीत उद्योग से बहुत समर्थन मिला है। यदि किसानों के लिए नहीं, तो कम से कम दिलजीत दोसांझ के बयानों के समर्थन में अधिकतर सितारे आए ही हैं, और अब पाकिस्तान और कनाडा जैसे देशों से भी इन्हें खूब समर्थन मिल रहा है। हो भी क्यों न इसका भी एक बड़ा कारण है। 

दरअसल, पंजाब के इन गायकों के इस पंजाबी प्रेम का एक पाकिस्तानी कनेक्शन भी है। कभी सोचा है कि वर्तमान पंजाबी गानों में अल्लाह, मौला, लाहौर, कराची जैसे शब्दों की भरमार क्यों है? इसके पीछे दो प्रमुख कारण है – एक तो इन्हें पाकिस्तान के जरिए काफी धन भी प्राप्त होता है और दूसरा यह कि इनके गाने पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत में भी काफी सुने जाते हैं। शायद इसीलिए जब दिलजीत दोसांझ विदेशी दौरे पर जाते हैं, तो वे अपने कार्यक्रमों का प्रबंधन रेहान सिद्दीकी जैसे प्रबंधकों को देते हैं, जिनके तार ISI से भी कथित तौर पर जुड़े हुए हैं।

लेकिन ऐसा क्यों है कि लगभग हर पंजाबी कलाकार इस समय भारत विरोधी तत्वों को किसान आंदोलन के नाम पर बढ़ावा दे रहा है, और किसान कानून का समर्थन करने वाले व्यक्ति का विरोध कर रहा? इसके पीछे सांस्कृतिक कम आर्थिक प्रभाव ज्यादा है। इस समय पंजाबियों के लिए बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया है। 

वो कैसे? दरअसल, पंजाबी का वर्तमान संगीत उद्योग 2012 के बाद से भारत में गैर फिल्मी म्यूज़िक के लिए सबसे बड़ा मंच बन गया है। इसका प्रभाव केवल भारत में ही नहीं, बल्कि यूके, यूएस, कनाडा, शेष यूरोप इत्यादि में बहुत है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इन देशों में जो प्रवासी भारतीय हैं, उनमें अधिकांश संख्या पंजाबियों की है, जो भर भर के इन कलाकारों पर अपना प्रेम और पैसा दोनों लुटाते हैं।  

लेकिन पंजाबी कलाकारों का यह पाकिस्तान और खालिस्तान प्रेम यहीं तक सीमित नहीं है। यदि कोई व्यक्ति उनके उद्योग से होकर भारत की वंदना करता है, और उसकी संस्कृति का गुणगान करता है, तो यही लोग उसे नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। विश्वास नहीं होता तो प्रख्यात गायक गुरदास मान से पूछ लीजिए। उन्होंने कुछ वर्षों पहले एक साक्षात्कार में कहा था कि जिस प्रकार से जापान में जापानी, यूके में अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं को प्राथमिकता दी जाती है, वैसे ही भारत में हिन्दी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस पर पंजाब के राजनेताओं से लेकर कलाकारों तक ने उन्हें खूब खरी खोटी सुनाई, और उन्हें सिंघु बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों से बात भी नहीं करने दी गई।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि धन का मोह ही पंजाबी कलाकारों को किसान आंदोलन के नाम पर भारत विरोधी रुख अपनाने को विवश कर रहा है। उन्हें ऐसा लगता है कि यह तरीका अपनाकर वो अपने विदेशी समर्थकों के बीच अपनी जगह पक्की करेंगे, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि अपना काम निकलने पर विदेशी अलगाववादी उन्हें पानी भी न पूछें! 

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