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Wednesday, December 16, 2020

एक और कोयला घोटाला और माओवादियों का बढ़ता वर्चस्व, सोरेन सरकार के नेतृत्व में झारखंड का हाल हुआ बेहाल

 


जब भी कभी झारखंड के बारे में बात होती है, तब एक ऐसे राज्य की छवि सामने उभरती है जो संसाधन संपन्न तो है लेकिन आर्थिक रूप से गरीब और माओवाद से ग्रस्त है।  इस तथ्य को देखते हुए कि राज्य संसाधन संपन्न है, ज्यादातर विश्लेषक राज्य की गरीबी के लिए यहाँ की राजनीति और सरकार को दोषी ठहराते हैं, और यह सच भी है।

हालांकि, पिछली भाजपा सरकार ने झारखंड की नीतियों में सुधार करने की कोशिश की और सफल भी हुई, लेकिन राजनीति में विफल रही और इसके परिणामस्वरूप 2019 के विधानसभा चुनाव में नुकसान हुआ।

हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झामुमो बीजेपी को पटखनी देने में कामयाब रही, और झामुमो तथा कांग्रेस की सरकार सत्ता में आते ही राज्य में भ्रष्टाचार के पुराने दिनों में वापस ला रही है, जिसके लिए वह जानी जाती थी।

सोरेन सरकार के सत्ता में आने के एक साल से भी कम समय में, प्रतिबंधित माओवादी संगठनों के पोस्टर अब राजधानी रांची के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं। प्रतिबंधित माओवादी संगठन तृतीया सम्मेलन प्रस्तुति समिति (टीएसपीसी) राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। यह राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों की चिंता का एक प्रमुख कारण बन गया है।

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, “TSPC ने रांची के रातू रोड जंक्शन जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में पोस्टर और एक लाल बैनर लगाया है। यह क्षेत्र VIP एरिया भी है तथा मुख्यमंत्री और राज्यपाल इसी मार्ग से हवाई अड्डे या विधानसभा जाते हैं।

यही नहीं, राज्य की JMM और कांग्रेस की सरकार ने ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के संचालन को रोक दिया है, जिसके कारण कंपनी को प्रति दिन 2 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।  झारखंड सरकार पहले से तय सीमा से अधिक ट्रांजिट परमिट चाहती है।  इसके अलावा, केंद्र सरकार ने आरोप लगाया है कि झारखंड सरकार 41 कोयला खानों की नीलामी को रोकने का प्रयास कर रही है, जिनमें से 9 झारखंड में हैं। इसका कारण कुछ और नहीं बल्कि पर्यावरणीय चिंता बताया जा रहा है।

बिना कोयले की खानों और ईसीएल के काम ठप करने के कारण हुए इन नुकसानों से झारखंड को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और इसे मिनी कोलगेट यानी कोयला घोटाला भी कहा जा सकता है।

झारखंड जनवरी में पहले भी सभी गलत कारणों से चर्चा में था, जब पत्थलगढी समर्थकों ने सात आदिवासियों को मार दिया था,  जिन्होंने कथित रूप से झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में पत्थलगढी आंदोलन का विरोध किया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार पत्थलगढी आंदोलन के सशस्त्र समर्थकों द्वारा सात लोगों को बंधक बना लिया गया था और फिर बाद में हत्या कर दी गई थी। बुरुगुलिकेरा गांव से घटना के तीन दिन बाद ही शव बरामद किया गया, जहां उन्हें एक जंगल में फेंक दिया गया था।

कई विशेषज्ञों ने पत्थलगढी आंदोलन के बारे में अपनी चिंता जाहिर की है, और जिस तरह से आदिवासी लोग अब एके-47 का प्रयोग कर रहे हैं, वह चिंताजनक है।

सिर्फ भ्रष्टाचार और माओवाद ही नहीं एक बार फिर से पत्थलगढी आंदोलन के शुरू होने आशंका बढ़ रही है।

संभावित माओवादी प्रभाव का आंदोलन दिन-प्रतिदिन उग्र और हिंसक होता जा रहा है।  कुछ रिपोर्टों ने इस आंदोलन से जुड़े आदिवासियों को अवैध अफीम व्यापार से भी जुड़ा हुआ बताया है।

झामुमो, कांग्रेस, और राजद की मिलीभगत से बनी इस भ्रष्टाचार की सरकार राज्य को अब गर्त में धकेल रही है। इस कारण से झारखंड अपनी वास्तविकता को खो रहा है। अपराधी और नक्सली राज्य में किसी की भी बेरोक-टोक हत्या कर रहे हैं। राज्य की मशीनरी ध्वस्त हो गई है और नक्सलवाद एक बार फिर से झारखंड को अपने शिकंजे में ले रहा है। इसके परिणामस्वरूप, झारखंड के भविष्य पर अंधकार दिखाई दे रहा है।

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