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Sunday, December 20, 2020

वर्ल्ड बैंक ने अपनी ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ रिपोर्ट में किए बड़े बदलाव

 


वर्ल्ड बैंक में इस बार काफी भूचाल आया था। हर वर्ष प्रकाशित होने वाली ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस रिपोर्ट में इस साल काफी खामियाँ पकड़ में आई, जिनमें प्रमुख था चीन की छवि खराब होने के बावजूद उसे सकारात्मक रेटिंग देना। अब मजबूरी में ही सही, पर वर्ल्ड बैंक को अपनी रिपोर्ट संशोधित करनी पड़ी है।

हाल ही में प्रकाशित ईकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, “अगस्त में वर्ष 2020 के डूइंग बिजनेस रिपोर्ट के प्रकाशन पर वर्ल्ड बैंक ने रोक लगा दी थी, क्योंकि चीन, UAE, सऊदी अरब एवं अज़रबैजान के डेटा में काफी अनियमितताएँ सामने आई थी।” इनके कारण चीन की रैंकिंग में कोई विशेष बदलाव नहीं आया था ।

चूंकि 2019 से ही चीन की गतिविधियों के विरुद्ध अमेरिका के नेतृत्व में एक वैश्विक अभियान चलाया जा रहा है। उसके ऊपर से इस वर्ष दुनिया भर में चीन द्वारा उत्पन्न वुहान वायरस के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को चीन ने जो नुकसान पहुंचाया, उसके कारण भी लोग चीन से काफी कुपित हैं। ऐसे में जब चीन को सकारात्मक रेटिंग दी गई, तो लोगों का भड़कना स्वाभाविक था।

आंकड़ों के अनुसार चीन की 2018 की रैंकिंग 78 थी, और उसका डूइंग बिजनेस स्कोर 65.3 था। लेकिन जब अनियमितताएँ सामने आई, तो पुनर्मूल्यांकन के बाद उसका स्कोर 64.5 था, जिसके अनुसार उसकी वास्तविक रैंक 78 नहीं, 85 थी। इसके अलावा विश्व बैंक ने कुछ अन्य बदलाव भी किए। जहां 16वें स्थान पर संयुक्त अरब अमीरात यानि UAE की रैंकिंग यथावत रही, तो वहीं सऊदी अरब की रैंक 62 से सिर्फ एक स्थान नीचे 63 पर आ गई। वहीं अज़रबैजान की रैंक में काफी सुधार भी हुआ।

उधर दूसरी ओर भारत की रैंक में भी काफी सुधार हुआ है। पिछले पाँच वर्षों में भारत ने 79 स्थानों की छलांग लगाई है, और अब उसका स्थान इस रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में 63वां स्थान है। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब डेटा में अनियमितताओं के कारण वर्ल्ड बैंक को जनता की आलोचना का सामना करना पड़ा हो।

चीन की विश्व बैंक में बढ़ती सक्रियता के कारण उसे इस संस्था को उल्लू बनाने का मानो बहाना सा मिल गया है। गलत और भ्रामक डेटा के साथ चीन न केवल वर्षों से दुनिया की आँखों में धूल झोंकता रहा है, बल्कि इसके बलबूते वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से काफी कर्ज़ भी वसूला है, जिसका इस्तेमाल चीन ने सदैव नापाक हरकतों को बढ़ावा देने के लिए किया है।

जिस समय चीन की अर्थव्यवस्था ढलान की ओर अग्रसर हो, जिसका अधिकतम श्रेय उसके विवादित BRI परियोजना को जाता है, तो ऐसे में ये खबर चीनी अर्थव्यवस्था के लिए किसी आपदा से कम नहीं होगी। RCEP को पूरी तरह समर्थन देने के लिए कोई भी विकसित देश तैयार नहीं है, चीन की हेकड़ी को LAC और दक्षिण चीन सागर के मोर्चों पर मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है, और तो और अब जापान के नेतृत्व वाली TPP तक चीन के बजाए उसके सबसे बड़े सरदर्द में से एक ताइवान को प्राथमिकता दे रही है। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में अप्रत्याशित बदलाव चीन के वास्तविक पतन का प्रारंभ हो सकता है।

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