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Saturday, December 19, 2020

जानिए, कोरोना के बाद डूबती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत ने कैसे दी चीन को पटकनी


कोरोना विश्व के सभी देशों की आर्थिक मजबूती के लिए एक परीक्षा की तरह था, जिसमें राजनीतिक निर्णय की क्षमता भी एक कारक थी। इस परीक्षा में दो देशों यानि भारत और चीन पर विश्व की उभरती अर्थव्यवस्था होने के कारण सभी की नजर थी। एक तरफ जहां चीन इस मंदी से उबरने का दावा कर रहा है लेकिन उसकी एक-के-बाद एक डिफ़ाल्ट होती कंपनियाँ चीन की पोल खोल रहीं है तो वहीं भारत धीरे-धीरे ही सही लेकिन मजबूती के साथ उबरता दिखाई दे रहा है और सकारात्मक राजनीतिक निर्णय क्षमता से न तो कंपनियाँ डूब रही हैं और नहीं कोई दिवालिया हो रहा है।

यानि स्पष्ट शब्दों में कहे तो भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था की तुलना में अधिक मजबूत और राजनीतिक निर्णय लेने में अधिक समझदार साबित हुआ है।

कोरोना के बाद चीन के वैश्विक बहिष्कार के कारण उसकी तकनीकी उद्योग में भारी गिरावट आई थी। हुवावे जैसी कंपनी तो बंद होने के कगार पर आ गयी, वहीं टेंसेंट को भी काफी नुकसान हुआ। वहीं कई चीनी कंपनियों ने डिफ़ॉल्ट करना शुरू कर दिया है। इनमें से तो कुछ सबसे बड़ी सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियां ही डिफ़ॉल्ट कर रही हैं, जो न केवल चीनी नागरिकों को बल्कि चीन के बाहर से उसे समर्थन करने वाली कंपनियों को भी नुकसान पहुंचा रही है।

प्रमुख डिफ़ॉल्ट कंपनियों में से एक Huachen Automotive Group है। इस साल के  शुरुआत में, Huachen 1 बिलियन युआन बॉन्ड के मूलधन और ब्याज चुकाने में असफल रहा, यानी लगभग 152 मिलियन डॉलर के बॉन्ड का डिफॉल्ट।

एक अन्य प्रमुख चीनी सरकार के स्वामित्व वाली उद्यम- Tsinghua Unigroup ने 450 मिलियन डॉलर के बांड पर मूल चुकाने में असफल रहा। कंपनी पर 2 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त कर्ज बकाया है और निवेशक 450 मिलियन डॉलर के बॉन्ड पर डिफ़ॉल्ट के डर से चिंतित हैं।

एक और चौंकाने वाला डिफ़ॉल्ट का मामला चीन के ‘Grey Rhino’ के नाम से मशहूर उद्यम Yongcheng coal and electricity का है। यह हाल ही में लगभग 152 मिलियन डॉलर के बांड को चुकाने में विफल रहा। वहीं चीन की सत्ता अलीबाबा और टेंसेंट होल्डिंग्स को स्वयं ही निशाना बना रही है।

यानि देखा जाए तो चीनी सरकार द्वारा डिफ़ॉल्ट कंपनियों को किसी तरह का बेलआउट पैकेज देने की संभावना भी नहीं है। वास्तव में, चीनी सरकार खुद कर्ज की समस्या में घिरी हुई है। जाहिर है, चीनी सरकार न तो अपनी कंपनियों को ठीक से स्टिमुलस दे सकती है और न ही अपने ऋणदाताओं के ऋण दायित्वों को पूरा करने की क्षमता के बारे में आश्वस्त है।

वहीं अगर भारत की बात करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की कोरोनोवायरस से जूझ रही अर्थव्यवस्था को विनिर्माण के आत्मनिर्भर वैश्विक केंद्र में बदलने की ओर कदम बढ़ाया है। सरकार ने महामारी और संबंधित लॉकडाउन से प्रेरित मंदी के खिलाफ तत्काल राहत देने के लिए लगभग 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी।

सरकार ने इस बड़ी योजना को अंजाम देने के लिए इस प्रकार योजना बनाई है कि सरकार पर सिर्फ 1 लाख करोड़ का ही बोझ पड़े ताकि कोरोना महामारी के समय में सरकार के सभी खर्चों की पूर्ति हो सके।

MSME सेक्टर को राहत प्रदान करते हुए सरकार ने आर्थिक पैकेज का ऐलान किया था। इस राहत पैकेज की कुल वैल्यू भी लगभग 6 लाख करोड़ थी। 13 मई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने MSMEs के लिए बिना गारंटी के 3 लाख करोड़ रुपये के लोन देने की घोषणा की थी, जिसका लगभग 45 लाख MSME फायदा उठा रहे हैं। इसकी समय-सीमा 4 वर्ष की होगी और 12 महीने तक मूलधन पर कोई ब्याज भी नहीं चुकाना होगा।

यह राहत पैकेज देश की कंपनियों को वित्तीय सहायता दे रहा है और देश में “मांग” को बढ़ा रहा है, जिससे manufacturing सेक्टर को भी बढ़ावा मिला है। नवंबर आते-आते इस पैकेज का परिणाम भी देखने को मिला और भारत में मैनुफेक्चुरिंग इंडेक्स उच्चतम स्तर पर रहा। वहीं कई कंपनियां, जैसे दुपहिया बजाज और TVS के सेल में वृद्धि दर दो अंको में रही। वहीं देश के कुल एक्सपोर्ट में भी 5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई।

 

इस मंदी से उबरने के लिए भारत सरकार ने न सिर्फ अपने देश की कंपनियों को स्टिमुलस पैकेज दे कर मंदी से उबरने में मदद की बल्कि उन्हें डूबने से भी बचाया, वहीं चीन की सरकार ने न सिर्फ उन्हें डूबते हुए चुपचाप देखती रही बल्कि अगर किसी कंपनी ने सत्ता के निर्णयों पर उंगली उठाने की कोशिश की तो सरकार ने उस कंपनी पर ही हमला शुरू कर दिया। CCP और उसके प्रचार तंत्र चाहते हैं कि हम यह विश्वास करें कि चीनी अर्थव्यवस्था तीव्र गति से बढ़ रही है। लेकिन वास्तविकता यह है कि चीन इतनी मुसीबत में है कि वह अपना कर्ज भी नहीं चुका सकता है। वहीं भारत अपने सही निर्णयों और अपनी कंपनियों को राहत दे कर अब वापस पटरी पर लौट चुका है।

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