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Monday, December 14, 2020

यदि उद्धव सरकार अपने पाँच वर्ष पूरे कर लेती है तो महाराष्ट्र से उद्योगों का जाना तय है

 


जब योगी आदित्यनाथ ने नोएडा में एक भव्य फिल्म सिटी के निर्माण को बढ़ावा देने हेतु बात की, तो इस बात पर महाराष्ट्र का वर्तमान प्रशासन, विशेषकर उद्धव ठाकरे भड़क गए, और उन्होंने ऐसा करने की चुनौती भी दे दी। लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही है। यदि ठाकरे सरकार ने अपनी नीतियाँ नहीं बदली, तो बॉलीवुड तो छोड़िए, जिस औद्योगिक ‘साम्राज्य’ के बल पर महाराष्ट्र का वर्तमान प्रशासन इतना उछलता है, वो भी पूर्ण रूप से उत्तर प्रदेश स्थानांतरित हो जाएगा।

ऐसा कैसे हो सकता है? दरअसल, महाराष्ट्र सरकार की वर्तमान नीतियाँ उद्योगों को बढ़ावा देने के बजाए उन्हें महाराष्ट्र से ही दूर भगा रही है। आरे क्षेत्र में प्रस्तावित मेट्रो शेड को चाहे स्थानांतरित करना हो, या फिर भविष्य में एक अहम रोल निभाने वाली हाइपरलूप परिवहन प्रोजेक्ट को रद्द करना हो, उद्धव सरकार ने अनेकों उद्योग विरोधी निर्णय लिए हैं।

तो अब प्रश्न यह है कि अब उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या है, जिससे महाराष्ट्र की जनता को सतर्क हो जाना चाहिए? दरअसल, उत्तर प्रदेश में चेन्नई या हैदराबाद जैसे सर्विस हब के मुकाबले रियल एस्टेट के दाम बहुत ही कम है, और यहाँ की सरकार दिल खोल कर निवेश का स्वागत करती है। विश्वास नहीं होता तो सैमसंग का ही उदाहरण देख लीजिए। मोबाइल और आईटी डिस्प्ले से संबंधित एक प्लांट को सैमसंग न सिर्फ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थानांतरित कर रहा है, अपितु इसके सफल संचालन हेतु 4825 करोड़ रुपये का निवेश भी कर रहा है। 

बात केवल यही नहीं है। उत्तर प्रदेश में निवेश करने वाली कंपनियों को न केवल सरकार वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करेगी, बल्कि उन्हें कानूनी पचड़ों में फँसने से भी बचाएगी। जब दुनिया वुहान वायरस से जूझ रही थी, तब उत्तर प्रदेश में निवेश करने के लिए आकर्षित करने हेतु कई श्रम सुधार भी किये गए, ताकि यूनियनबाज़ी के कारण राज्य के औद्योगिक विकास में कोई बाधा नहीं पहुंचे।

अब यहीं अगर महाराष्ट्र की तुलना की जाए, तो उसकी दुर्गति के लिए केवल और केवल उद्धव सरकार ही जिम्मेदार है। वुहान वायरस दुनिया के बाकी हिस्सों की भांति ही भारत में भी तेजी से फैला। लेकिन अगर उत्तर प्रदेश ने इस संकट के समय को अवसर के तौर पर चुना, तो वहीं महाराष्ट्र के पास सभी साधन और अवसर होते हुए भी प्रशासन ने कुछ नहीं किया। परिवहन में नवीनीकरण तो बहुत दूर की बात, मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर तक को दुरुस्त करने में उद्धव सरकार आनाकानी कर रही है।

दिलचस्प बात तो यह है कि मुंबई पश्चिमी जगत और पूर्वी जगत के बीचोंबीच स्थित है, और उसका टाइम ज़ोन भी व्यापार के अनुसार अनुकूल है, जिससे उसे एक प्रखर वित्तीय केंद्र के रूप में उभरने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती। इसी परिप्रेक्ष्य में लाइवमिन्ट ने अपनी जुलाई की एक रिपोर्ट में लिखा था, “मुंबई विविधता से परिपूर्ण है। पूर्व और पश्चिम के बीचोंबीच वह एक उत्तम टाइम ज़ोन क्षेत्र में स्थित है, जो उसके लिए अत्यंत लाभकारी है। ऐसे में कुछ रणनीतिक सुधार इसे हाँग-काँग को हो रहे नुकसान से अपने आप को लाभान्वित करने योग्य बना सकते हैं।” पर ऐसे काम के लिए सुधार प्रेमी प्रशासक का होना अत्यंत आवश्यक है, जो देवेन्द्र फड़नवीस के सत्ता छोड़ते ही महाराष्ट्र से उड़न-छू हो गया।

लेकिन सच तो यह है कि उद्धव ठाकरे की सरकार को मानो महाराष्ट्र के विकास से सख्त एलर्जी है। ऐसी कोई परियोजना नहीं है जिसपर उन्होंने ताला न लगाया हो, और विरोध करने वालों को वह या तो अपमानित करते हैं, या फिर शिवसेना के गुंडों से पिटवाते हैं, और जब इतना सब कुछ होने से भी कोई फरक नहीं पड़ता, तो अर्नब गोस्वामी और समीत ठक्कर की तरह उन्हें झूठे आरोपों में जेल में बंद भी कर देते हैं। अब ऐसे दमनकारी राज्य में भला कौन निवेश करने का जोखिम उठाएगा?

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि महाराष्ट्र सरकार यदि पूरे पाँच साल टिक गई, तो जो महाराष्ट्र देश के सबसे विकसित राज्यों में से एक माना जाता था, वो जल्द ही देश के पिछड़े राज्यों में गिना जाने लगेगा। महाराष्ट्र के हाथ से वैसे ही वैश्विक वित्तीय केंद्र बनने का अवसर जा चुका है, लेकिन यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो एक-एक करके सभी उद्योग महाराष्ट्र छोड़कर देश के अन्य राज्यों, और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में स्थानांतरित हो जाएंगे।

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