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Saturday, December 5, 2020

हैदराबाद में चोट खाने के बाद ओवैसी बंगाल में पूरा दम-खम लगाएंगे, वहाँ भी BJP को ही फायदा होगा

 


हाल ही में सम्पन्न हुए ग्रेटर हैदराबाद निकाय चुनाव में न केवल भाजपा ने पूरी आक्रामकता के साथ चुनाव लड़ा, बल्कि 45 से अधिक सीटों पर विजय प्राप्त कर AIMIM, ओवैसी और टीआरएस का घमंड भी तोड़ा, और तेलंगाना में अपने आप को प्रमुख विपक्ष के तौर पर स्थापित भी किया।

अब ग्रेटर हैदराबाद के निकाय चुनाव राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टी के लिए वैसे तो इतने अहम नहीं थे, लेकिन अपने आक्रामक चुनाव अभियान के माध्यम से भाजपा ने इस स्थानीय चुनाव को भी राष्ट्रीय महत्व का विषय बना दिया। निकाय चुनाव में आक्रामक प्रचार की जिस रणनीति से नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं ने भाजपा को गुजरात में एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया, उसी रणनीति से भाजपा ने ओवैसी को उसी के गढ़ में चुनौती देते हुए ग्रेटर हैदराबाद के चुनाव को आक्रामक तरीके से लड़ा, और चुनाव में AIMIM को भी बुरी तरह पछाड़ा।

पिछली बार AIMIM को करीब 44 सीटें मिली थी, और वह प्रमुख विपक्षी पार्टी थी। इस बार उसे अधिक नुकसान नहीं हुआ, परंतु भाजपा ने उसे पछाड़ते हुए प्रमुख विपक्षी पार्टी का दर्ज प्राप्त किया। यह चुनाव कितना अहम है, इसका अंदाज आप इसी बात से लगा सकते हैं कि चारमीनार क्षेत्र में जहां AIMIM को कोई चुनौती भी नहीं दे पाता था, वहाँ भाजपा ने सेंध लगाते हुए 36 में से 7 सीटों पर विजय प्राप्त की।

ऐसे में अब ये कहना गलत नहीं होगा कि ओवैसी का गढ़ उसके हाथ से फिसलता जा रहा है, और इसीलिए अब वह अन्य राज्यों में भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। बंगाल में तो वे ममता बनर्जी की तृणमूल काँग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव तक लड़ने को तैयार है, परंतु तृणमूल काँग्रेस अल्पसंख्यक वोट बैंक पर अपनी पकड़ और अपने प्रभुत्व को खोना नहीं चाहती। ऐसे में अब मुकाबला काफी दिलचस्प होने वाला है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि AIMIM का प्रमुख उद्देश्य बंगाल के मुसलमानों में अपना प्रभाव बढ़ाना है। इस उद्देश्य से वे ममता बनर्जी के प्रमुख विरोधी भी बनते हैं। अब स्थिति जैसी भी हो, यहाँ फायदा न केवल ओवैसी का, बल्कि भाजपा का भी होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि ममता बनर्जी किन्ही कारणों से AIMIM के साथ गठबंधन को स्वीकृति देती है, तो न केवल मुकाबला त्रिकोणीय होगा, बल्कि वोटों के ध्रुवीकरण से भाजपा को भी फायदा होगा। लेकिन अगर ममता बनर्जी गठबंधन मना कर देती है, तो काँग्रेस और वाम मोर्चा के गठबंधन के चलते मुकाबला चतुष्कोणीय होगा, जिसमें सर्वाधिक फायदा भाजपा को ही होगा।

ऐसे में धीरे धीरे तेलंगाना को अपने हाथ से फिसलता देख ओवैसी ने नए गढ़ की तलाश शुरू कर दी, ताकि अगर तेलंगाना में उनका प्रभाव खत्म हुआ, तो वे अन्य राज्यों का सहारा ले सके। लेकिन ये बात केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं है। सूत्रों की माने तो बंगाल में तनिक भी सफलता मिलने पर ओवैसी का अगला लक्ष्य राजस्थान होगा, जहां करीब 40 विधानसभा सीटों पर वे अपनी धाक जमा सकते हैं।

जब अमित शाह ने हैदराबाद को नवाबी और निज़ामी सभ्यता से मुक्त करने की हुंकार भरी थी, तो उन्होंने ये बात यूं ही नहीं कही थी। ग्रेटर हैदराबाद में जिस प्रकार से भाजपा ने 49 सीटें प्राप्त की हैं, उससे स्पष्ट पता चलता है कि अब तेलंगाना में किसका डंका बजने वाला है, और ये न ओवैसी और न ही उनकी पार्टी AIMIM के लिए कोई शुभ संकेत है।

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