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03 November 2020

Macron के बाद डेनमार्क भी कट्टरपंथ के खिलाफ फुल एक्शन में है, मस्जिदों की विदेशी फंडिंग रोकी

 


इन दिनों यूरोप में एक अनोखा अभियान चल रहा है। फ्रेंच शिक्षक सैमुएल पैटी की निर्मम हत्या के बाद से जिस तरह फ्रांस ने कट्टरपंथी इस्लाम के विरुद्ध मोर्चा खोला है, उसने यूरोप के कई देशों को प्रेरणा दी है, जो अंतर्राष्ट्रीय दबाव या फिर वामपंथी बुद्धिजीवियों के कथित आक्रोश के चलते आवश्यक कदम उठाने से हिचकिचाते थे। अब फ्रांस की भांति डेनमार्क ने भी कट्टरपंथी इस्लाम के विरुद्ध मोर्चा खोलते हुए अपने यहां नागरिकता नियमों में कुछ बदलाव किए हैं।

डेनमार्क ने अभी हाल ही में मस्जिदों की विदेशी फंडिंग पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाते हुए इसे एक आपराधिक जुर्म करार दिया है। मिडिल ईस्ट मॉनिटर की रिपोर्ट के अनुसार, “डेनमार्क एक नए विधेयक को पेश करेगा, जिसके अंतर्गत आतंकवाद पर रोक लगाने के लिए विदेशी देशों द्वारा मस्जिदों को दी गई फंडिंग स्वीकारना आपराधिक माना जाएगा।”

इस विधेयक के बारे में एक फ़ेसबुक पोस्ट में डैनिश गृह मंत्री Mattias Tesfaye ने एक महीने पहले ही इशारा किया था, जब उन्होंने कहा कि “जो भी संस्था, व्यक्ति या राष्ट्र हमारे राष्ट्र में लोकतान्त्रिक मूल्यों का हनन करने, मानवाधिकार का उल्लंघन करने के उद्देश्य से मस्जिदों को दान देगा, उसे हम ये काम नहीं करने देंगे”।

इस विधेयक पर पहले से ही डेनमार्क की सरकार ने विपक्ष से बातचीत कर ली है, क्योंकि वह किसी भी कीमत पर राष्ट्रहित से समझौता नहीं करना चाहते। इस विधेयक का मूल उद्देश्य यही है कि धार्मिक स्वतंत्रता यानि पंथनिरपेक्षता के नाम पर राष्ट्रहित से कोई समझौता नहीं होगा। लेकिन डेनमार्क यहीं तक सीमित नहीं रहा। डेनमार्क की संसद ने सर्वसम्मति से एक यहां विधेयक को लागू करने पर स्वीकृति जताई है, जिसमें आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर किसी भी डैनिश नागरिक की नागरिकता रद्द करने में एक पल भी नहीं गंवाया जाएगा।

जी हाँ, आपने ठीक पढ़ा। डेनमार्क में अक्टूबर 2019 में पारित नागरिकता अधिनियम के अंतर्गत जो भी व्यक्ति डेनमार्क में आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाया गया, उसकी नागरिकता न केवल निरस्त की जाएगी, बल्कि यदि वह विदेश में है, तो उसके डेनमार्क वापसी पर पूर्णतया प्रतिबंध लग जाएगा। इस नए अधिनियम के अंतर्गत उन लोगों पर प्रमुख तौर से कार्रवाई की जाएगी, जो इस्लामिक स्टेट के लिए सीरिया या इराक में लड़े थे। यदि आरोपी को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तो उसे चार हफ्ते का समय अपील के लिए दिया जाएगा।

इस अधिनियम के बारे में आगे बताते हुए डेनमार्क की प्रधानमंत्री Mette Frederiksen ने कहा, “यह लोग डेनमार्क के साथ विश्वासघात करते हैं, और हिंसा के बल पर हमारे लोकतंत्र और उसके अंतर्गत मिल रही सुविधाओं पर प्रहार करना चाहते हैं। ऐसे लोग हमारे राष्ट्र की अखंडता के लिए बहुत बड़ा खतरा सिद्ध हो सकते हैं, और ऐसे लोगों की डेनमार्क में कोई आवश्यकता नहीं है।”

लेकिन Mette Frederiksen वहीं पर नहीं रुकी। उन्होंने आगे कहा, “इस समय हम इस खतरे को नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि बॉर्डर क्षेत्र के निकट कुर्द समुदाय द्वारा नियंत्रित ISIS के कैंप कभी भी नष्ट हो सकते हैं, और डैनिश नागरिकता वाले विदेशी नागरिकों के अवैध घुसपैठ से इनकार नहीं किया जा सकत।”

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अब डेनमार्क ने भी फ्रांस की भांति ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख लिया है। अपने नागरिकता अधिनियमों में बदलाव कर डेनमार्क ने एक स्पष्ट संदेश दिया है – राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं।

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