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17 November 2020

Chhath Puja 2020: जानिए क्यों मनाया जाता है छठ पर्व और क्या है इसकी पौराणिक कथा

 इस साल छठ पूजा (Chath pooja 2020) 20 नवंबर को की जाएगी। यह पर्व कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है और इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से होती है। यह त्योहार चार दिनों तक मनाया जाता है। यह पर्व हर मां अपनी संतान की खुशहाली और अच्छे और स्वस्थ्य जीवन की कामना से किया जाता है। इस त्योहार में भगवान् सूर्य की उपासना की जाती है। महिलाएं तो इस त्योहार को ख़ुशी ख़ुशी करती ही हैं वहीं पुरुष भी इस व्रत को समान रूप से करते हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मुख्य पूजा के बाद सप्तमी की सुबह सूर्य को अर्घ्य देने के बाद इस त्योहार का समापन किया जाता है। यह व्रत काफी मुश्किल भरा होता है क्योंकि इस व्रत में पूरे 36 घंटे तक व्रती न कुछ कहते हैं और न ही कुछ पीता है। आज हम आपको इस पर्व का इतिहास और पौराणिक कथा के बारे में बताते हैं-

पौराणिक कथा इस प्रकार है कि प्रियंवद नाम के राजा की कोई भी संतान नहीं थी। उन्होंने बहुत प्रयास किये परन्तु उन्हें यह सुख नहीं मिल पाया जिसके बाद उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। यह यज्ञ महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए कराया था जिसमे उन्होंने प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रुप में दी। जिसके बाद उनके घर में एक सुन्दर से पुत्र ने जन्म लिया परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि वह पुत्र मरा हुआ था।

तब राजा प्रियंवद बहुत दुखी हुए। उसके बाद वे अपने पुत्र को लेकर श्मशान पहुंचे और स्वयं भी प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना उनके सामने प्रकट हुईं। उसके बाद उन्होंने राजा से कहा कि वो उनकी पूजा करें। आपको बता दें कि ये देवी सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से पैदा हुई हैं, इसी वजह से इन्हे छठी मइया कहा जाता है। माता के कहे मुताबिक राजा ने पुत्र इच्छा की कामना से छठी मइया का व्रत किया, जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि तभी से संतान प्राप्ति और संतान के सुखी जीवन के लिए छठ की पूजा की जाती है।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार छठ त्योहार की शुरुआत महाभारत काल के समय से हुई थी। ऐसा माना जाता है कि इस त्योहार की शुरुआत सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कहा जाता है कि कर्ण उस समय रोजाना घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य देव की पूजा और उनको अर्घ्य दिया करते थे। सूर्य देव की कृपा से ही वह एक महान योद्धा बने। इसी कारण आज भी छठ में सूर्य को अर्घ्य देने है।

एक और कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राज-पाठ कौरवों से जुए में हार गए थे उसी के बाद द्रोपदी ने छठ व्रत का आरम्भ किया था। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से ही पांडवों को उनका पूरा राजपाठ वापस मिल गया था। वहीं लोकप्रचलित मान्यता ये है कि सूर्य देव और छठी मईया के भाई हैं। इसी कारण छठ के त्योहार में छठी मईया के साथ सूर्य देव की भी आराधना की जाती है।

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