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20 November 2020

‘धर्मसंकट में फंसी ममता’ पश्चिम बंगाल में ओवैसी ने अपनी चाल चल दी है

 


कुछ भी कहिए, पर भारतीय राजनीति में दो ऐसे लोग है, जिनकी विचारधारा चाहे जैसी हो, उनके राजनीतिक सूझबूझ पर कोई संदेह नहीं कर सकता। एक है शरद पवार, तो दूसरे AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी। बिहार में तहलका मचाने के बाद अब जनाब ने सबको चौंकाते हुए तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनाव से पहले गठबंधन करने की पेशकश की है।

ओवैसी के अनुसार यदि ममता बनर्जी चाहे, तो जो भाजपा उनके लिए सिरदर्द बनी हुई है, उसे वह AIMIM के साथ गठबंधन कर बुरी तरह हरा सकती हैं। इससे ममता सत्ता में बनी रहेंगी। अभी हाल ही में बिहार में अपने पहले आधिकारिक चुनाव में 5 सीटें जीतने वाले ओवैसी ने निर्णय लिया है कि वह पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव लड़ेंगे, जहां उनकी नज़र इस्लाम बहुल जिलों में अपना वर्चस्व जमाने पर होगी।

दिलचस्प बात यह है कि ओवैसी ने यह बयान ऐसे समय पर दिया है, जब अप्रत्यक्ष रूप से ममता बनर्जी ने उनपर हमला करते हुए हाल ही में कहा कि बंगालियों को बाहरी ताकतों से बचने और लड़ने की जरूरत है। ऐसे में ओवैसी ने गठबंधन का प्रस्ताव देकर ममता बनर्जी की स्थिति ऐसी कर दी है, कि अब वो चाहे जो भी निर्णय ले, अंत में पराजय उन्हीं की होगी।

अब अगर ममता बनर्जी हाँ करती है, तो क्या होगा? निस्संदेह बंगाल में AIMIM का कद बढ़ेगा, हां, ममता का सेक्युलर वोट बैंक यथावत रहेगा, परंतु ममता के निर्णयों में ओवैसी का हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। इसके अलावा ममता और ओवैसी के साथ आने से वोटों का ध्रुवीकरण भी होगा, जिसका जबरदस्त फायदा भाजपा को मिलेगा, क्योंकि कांग्रेस और सीपीआई ने पहले ही अपना गठबंधन बनाकर तृणमूल कांग्रेस और उसका साथ देने वाले किसी भी दल से भिड़ने का निर्णय लिया है।

लेकिन अगर ममता बनर्जी ने साथ नहीं दिया, जिसके आसार अधिक दिख रहे हैं, तो असदुद्दीन ओवैसी को और अधिक फायदा होगा। ओवैसी ने बिहार चुनाव में विशेष रूप से सीमांचल क्षेत्र पर अपना ध्यान केंद्रित किया था, जहां अधिकांश विधानसभा सीटों के क्षेत्र में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। जब बंगाल में वे मैदान में उतरेंगे, तो इससे न सिर्फ AIMIM की पहचान एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर उभर के आएगी, जो तेलंगाना के बाहर भी चुनाव लड़ने में सक्षम होगी, अपितु कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों के वोट बैंक को भी काफी नुकसान पहुंचाएगी, क्योंकि मुसलमान उस लीडर का अधिक साथ देंगे, जो उनका अपना हो, न कि वह जो उनका अपना होने का दावा करता हो। ये हमने बिहार चुनाव में भी देखा था।

तृणमूल कांग्रेस ये बात भली भांति जानती है, इसीलिए वह अभी से ही जनता की नज़रों में AIMIM को गिराने में लगी हुई है। टाइम्स नाऊ से बातचीत के दौरान तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगात रॉय ने बताया, “आपको क्या लगता है, ओवैसी यहां क्यों आये हैं? उन्हें यहां भगवा पार्टी [भाजपा] ने भेजा है, ताकि तृणमूल काँग्रेस का वोट शेयर कम हो सके”। वहीं, दूसरी ओर बंगाल काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में काँग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी  ने कहा, “ओवैसी का लक्ष्य है समाज में और ध्रुवीकरण लाना, पर वे भूल गए हैं कि बंगाल वर्षों से ध्रुवीकरण और नफरत की राजनीति को नकारती रही है”।

सच कहें तो गठबंधन का प्रस्ताव देकर असदुद्दीन ओवैसी ने न केवल अपनी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया है, बल्कि ममता बनर्जी के लिए दुविधा उत्पन्न कर दी है। यदि ममता कोई जोखिम नहीं उठाती है, तो भी उनका नुकसान है, और यदि वह ओवैसी के साथ आने का जोखिम लेती है, तब भी उन्हीं का नुकसान होगा।

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