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06 November 2020

अमेरिकी मीडिया के दावों के विपरीत अमेरिका में कोई ‘ब्लू वेव’ नहीं थी



 
अमेरिकी चुनावों से पहले ही अमेरिका का लिबरल वर्ग चुनावों में एक “Blue Wave” आने का दावा कर रहा था। इन चुनावी विश्लेषकों का यह दावा था कि लोगों में ट्रम्प के खिलाफ बढ़ रहे गुस्से के कारण बाइडन को चुनाव जीतने में बेहद आसानी होने वाली है। हालांकि, महज़ 36 घंटों के अंदर ही चुनावी विश्लेषकों के ये सभी दावे धरे के धरे रह गए हैं। फ्लॉरिडा और Texas जैसे बड़े राज्य जीतकर ट्रम्प ने बाइडन के लिए बड़ी चुनौती पेश की है। वर्ष 2016 की तरह ही इस बार भी अमेरिकी “एक्स्पर्ट्स” चुनावी स्थिति को भांपने में पूरी तरह असफल रहे।

2016 में तो चुनाव के दिन ही New York Times ने एक पोल के आधार पर यह ऐलान कर डाला था कि Hilary Clinton के जीतने के 85 प्रतिशत अनुमान हैं। लेकिन इस बार भी अमेरिका की मेनस्ट्रीम मीडिया अपने पुराने कारनामों से कोई सीख लेने में असफल दिखाई दी। ट्रम्प को ना सिर्फ कुछ बड़े राज्यों में जीत मिली है बल्कि Pennsylvania, North Carolina और Georgia जैसे राज्यों में भी वे आगे चल रहे हैं। Arizona और Nevada जैसे राज्यों में अभी भी बाज़ी पलट सकती है और यहाँ भी आखिर समय में ट्रम्प को lead मिल सकती है।

चुनावों से पहले अमेरिका में यह माहौल बनाया गया था कि देश में Blue Wave आने वाली है और इसीलिए चुनाव अभियान में बराक ओबामा को भी शामिल किया गया था, लेकिन Democrats की यह कोशिश पूरी तरह नाकाम सिद्ध हुई। अमेरिका के लेफ्ट-लिबरल कबाल के इस कैम्पेन के पीछे के कुछ बड़े कारणों पर नज़र डालते हैं।

Democrats और लेफ्ट मीडिया अक्सर अपने Echo-Chambers में रहना पसंद करते हैं, जहां वे एक ही तरह की मानसिकता के लोगों के बीच रहते हैं। इस तरह ये लोग सिर्फ वही देखते और सुनते हैं, जो वे देखना और सुनना चाहते हैं। वर्ष 2016 में भी इन चुनावी विश्लेषकों के साथ यही देखने को मिला था। जमीनी स्तर पर सच्चाई को नकारकर यह लोग अपने वैचारिक सीमाओं में बंधकर चुनावी विश्लेषण करना शुरू कर देते हैं और अब की बार भी अमेरिका के विश्लेषकों ने यही किया। हमें अक्सर यह देखने को मिलता है कि राजनेता अपने यहाँ मीडिया को सेंसर कर देते हैं। लेकिन अमेरिका में हमें ठीक उल्टा देखने को मिला जहां मीडिया और सोशल मीडिया दिग्गजों ने मिलकर ट्रम्प के चुनाव अभियानों को सेंसर किया और ट्रम्प के खिलाफ माहौल बनाया!

इसके साथ ही दुनियाभर के लोकतान्त्रिक देशों में वोटर्स अक्सर अपनी चुनावी पसंद को निजी जीवन तक ही सीमित रखने में विश्वास रखते हैं। अमेरिका की बात करें तो ट्रम्प के समर्थकों को अक्सर घृणा की नज़र से देखा जाता है और यह माना जाता है कि ट्रम्प का प्रत्येक समर्थक “ट्रम्प की तरह ही” रेसिस्ट, LGBT विरोधी, महिला विरोधी होगा! ऐसे में चुनाव से पहले किए जाने वाले Polls में भी ट्रम्प के समर्थक खुलकर अपनी चुनावी पसंद बताने से बचते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी मीडिया के चुनावी अनुमान वर्ष 2016 में भी गलत साबित हुए थे और आज भी गलत साबित हुए हैं।

इसी के साथ-साथ अपने फर्जी चुनावी विश्लेषणों से अमेरिकी लिबरल मीडिया Democrats के पक्ष में हवा बनाने का काम भी करती रही है। अक्सर अमेरिकी लोगों से जमीनी स्तर की सच्चाई छिपाने का काम किया जाता है। यही कारण है कि लोगों की सोच को प्रभावित करने के लिए अक्सर अमेरिकी मेनस्ट्रीम मीडिया झूठ को प्रसारित करने में ही अपनी शान समझती है। लेकिन इस सब के बावजूद अमेरिका में Blue wave दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रही है। हो सकता है कि ट्रम्प को इन चुनावों में बहुमत हासिल ना हो, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अमेरिकी विश्लेषकों के मत के ठीक उलट ट्रम्प ने बाइडन के सामने एक कड़ी चुनौती पेश की है।

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