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20 November 2020

रूस जिनपिंग के हाथ से अफ्रीका को छिनने के लिए तैयार है

 


चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच जहां एक तरफ पूरी दुनिया Indo-Pacific पर अपना ध्यान केन्द्रित किए हुए है, तो वहीं रूस अपनी नज़र अफ्रीका पर टिकाये बैठा है। यूरोप से लेकर अमेरिका और भारत, ये सभी ताकतें हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में ही अपना पूरा दमखम दिखा रही हैं। UK, नीदरलैंड्स, जर्मनी और फ्रांस भी अपनी Indo-Pacific नीति को जारी कर चुके हैं, लेकिन पुतिन के दिमाग में कुछ और ही चल रहा है। इसी कड़ी में अब रूस ने यह ऐलान किया है कि वह अफ्रीकी देश सूडान में अपने एक नेवल बेस की स्थापना करने वाला है, जहां पर nuclear vessels भी तैनात किए जाएँगे।

अफ्रीका पर चीन का बेहद ज़्यादा आर्थिक प्रभाव है। अकेले अफ्रीका पर ही चीन का करीब 150 बिलियन डॉलर का कर्ज़ है। इसके साथ ही अफ्रीकी देश चीन के साथ ही सबसे ज़्यादा ट्रेड करते हैं। ऐसे में अब रूस सुरक्षा क्षेत्र के ज़रिये अफ्रीका पर अपने प्रभाव को बढ़ाने की फिराक में है।

सुरक्षा दृष्टि से देखा जाये तो रूस का अफ्रीका पर प्रभाव कुछ कम भी नहीं है। अफ्रीका के अलग-अलग क्षेत्रों में रूस के militias और mercenaries सक्रिय हैं। हाल ही में Central African Republic (CAR) में भी रूस ने अपने एक सैन्य दफ्तर को खोला था। इसके साथ ही रूस ने CAR को 10 बख्तरबंद गाडियाँ भी गिफ्ट की थीं। यह तो कुछ भी नहीं, रूस अफ्रीका का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर भी है।

DW की एक रिपोर्ट के मुताबिक  अल्जीरिया, इजिप्त, सूडान और अंगोला जैसे देश बड़ी मात्रा में रूस से हथियार खरीदते रहे हैं। अफ्रीका में रूस और चीन की स्थिति को सूडान के उदाहरण से समझा जा सकता है। सूडान आर्थिक तौर पर चीन पर बेहद ज़्यादा निर्भर है। वर्ष 2018 में चीन ने अफ्रीका में करीब 60 बिलियन डॉलर का निवेश करने का फैसला लिया था, जिसमें से 10 बिलियन डॉलर अकेले सूडान में निवेश किया गया था। दूसरी तरफ सूडान सुरक्षा क्षेत्र में रूस का करीबी सहयोगी है। सूडान में रूस ना सिर्फ नेवल बेस स्थापित कर रहा है, बल्कि सूडान के जरिये ही रूस बाकी अफ्रीकी देशों पर भी अपने प्रभाव को बढ़ाने की फिराक में है।

अफ्रीका प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर एक ऐसा continent है, जिसपर चीन अपना कब्ज़ा जमाना चाहता है। अफ्रीका में चीन के सामने कोई खास बड़ी चुनौती भी नहीं है क्योंकि अमेरिका और बाकी यूरोपीय शक्तियाँ यहाँ खासा ध्यान देने में असफल साबित हुई हैं। अब रूस यहाँ अपना वर्चस्व को मजबूत करना चाहता है।

हाल ही में अफ्रीकी देश माली में भी हमें रूस का खासा प्रभाव देखने को मिला था। यह आरोप लगे थे कि माली में दो सैन्य अफसरों ने रूसी समर्थन के बाद ही देश में तख़्तापलट किया था। यह तख़्तापलट चीन के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था क्योंकि इससे उसके BRI प्रोजेक्ट को देश में बड़ा झटका लगा था।

रूस की अफ्रीका नीति स्पष्ट है। वह चीन के आर्थिक प्रभाव को तोड़ने के लिए सुरक्षा क्षेत्र में चीन को पटखनी दे सकता है और सूडान और माली में रूस ऐसा सफलतापूर्वक कर भी चुका है। अफ्रीका पर चीन की मजबूत होती पकड़ चीन के लिए बड़ा खतरा है। अफ्रीका और मध्य एशिया के रास्ते रूस अपना खोया प्रभुत्व दोबारा पाना चाहता है, और इसीलिए उसका ध्यान अभी Indo-Pacific पर नहीं, बल्कि अफ्रीका पर है।

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