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02 November 2020

जंग और राजनीति में भारत के साथ पंगे लेने के बाद अब भारत को आर्थिक तौर पर लुभाने की कोशिश कर रहा चीन

 

जब टिकटॉक पर मोदी सरकार ने प्रतिबंध लगाया था, तब विपक्ष सहित कई बुद्धिजीवियों ने मोदी सरकार का उपहास उड़ाया था, क्योंकि उन्हें लगा कि भला इससे चीन का क्या नुकसान रहेगा? लेकिन मोदी सरकार शायद चाणक्य नीति की एक अहम नीति को बहुत अच्छे से जानती है – जो प्रभाव आर्थिक दंड में है, वो और किसी प्रकार के दंड में नहीं। अब इसका परिणाम यह है कि हर मोर्चे पर भारत से मात खाने के बाद अब चीन आर्थिक मोर्चे पर भारत को मनाने के लिए आगे आया है। वो भारत से सामान खरीदकर ये सन्देश दे रहा कि वो भारत को आज भी मित्र मानता है।

पिछले कुछ हफ्तों से चीन कई भारतीय वस्तुओं को धड़ल्ले से खरीदने में जुटा हुआ है। इनमें प्रमुख है कैस्टर ऑयल, सोयाबीन, मूंगफली का तेल और स्टील एक्स्पोर्टस जैसी वस्तुएं हैं, जिन्हें चीन धड़ल्ले से खरीद रहा है। कुछ रिपोर्ट्स [जिनकी अभी पुष्टि नहीं हुई है] के अनुसार चीन अन्य देशों के रास्ते भारत के चावल को इम्पोर्ट कर रहा है, लेकिन ये बात यहीं तक सीमित नहीं है, क्योंकि ये देश भारत से स्टील और रबर के उत्पाद भी बराबर मात्रा में खरीद रहा है। गौर करें तो ये चीन के व्यव्हार के विपरीत है जिस चीन ने अपने खिलाफ जाने पर ऑस्ट्रेलिया और अन्य कई देशों पर आर्थिक दबाव बनाने का प्रयास किया वो भारत से सामान खरीद रहा। स्पष्ट है वो भारत को ये सन्देश देना चाहता है कि वो भारत के साथ कोई शत्रुता नहीं रखना चाहता।

अगर ध्यान से देखा जाए तो चीन भारत के साथ अपने संबंधों में आई कड़वाहट को दूर करना चाहता है। गलवान घाटी के हमले और वुहान वायरस के कारण भारत ने चीन से आर्थिक तौर पर अपने संबंधों पर विराम लगा दिया था, और CAIT जैसे व्यापारिक संगठनों ने चीन से आ रहे सामानों का पूर्ण बहिष्कार करने पर जोर दिया, जिसके अंतर्गत वह चीनी अर्थव्यवस्था को दिसंबर 2021 तक 1 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक झटका देना चाहते हैं।

अभी चीन आर्थिक तौर पर आधी से अधिक दुनिया से अलग पड़ चुका है। अमेरिका तो पहले ही उसके पीछे हाथ धोके पड़ा है, उसके ऊपर से LAC पर PLA की गतिविधियों ने भारत को भी उसके विरुद्ध कर दिया है। इसके अलावा यूरोपीय दौरे पर चीनी विदेश मंत्री की गुंडई के कारण अब पूरा यूरोप चीन के विरुद्ध मोर्चा संभाल चुका है, और चीन की साम्राज्यवादी नीतियों के कारण रूस ने भी उसका साथ छोड़ दिया है, जिसके कारण अब चीन पुनः दुनिया का विश्वास जीतने में लगा हुआ है।

लेकिन भारत के व्यापारी चीन के इस बदले हुए स्वभाव को हल्के में लेने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है। चीन के वर्तमान खरीददारी, विशेषकर कैस्टर सीड्स की भारी खरीददारी के  पीछे अनेक भारतीय व्यापार संगठनों ने अपनी चिंता जताई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय कैस्टर ऑयल के सबसे बड़े निर्माताओं एवं आपूर्ति कर्ताओं में से एक है, और चीन केवल कैस्टर ऑयल को खरीद ही नहीं रहा है, बल्कि भारत में अन्य संसाधनों के बारे में भी पूछताछ कर रहा है।

इसपर प्रकाश डालते हुए मनी कंट्रोल के रिपोर्ट में बताया गया, “27 अक्टूबर को ऑयलसीड क्रशर के मुख्य प्रबंधक संगठन Solvent Extractors Association of India (SEAI) ने आधिकारिक तौर पर चीन द्वारा कैस्टर सीड्स के धड़ल्ले से खरीदने के मुद्दे पर चिंता जताई। SEAI के अध्यक्ष अतुल चतुर्वेदी ने इसके संबंध में वाणिज्य मंत्रालय को इस विषय पर आवश्यक कार्रवाई करने की याचना भी की।”

SEAI के कार्यकारी निदेशक बी वी मेहता के अनुसार, “चीन जिस प्रकार से हमसे उत्पाद खरीद रहा है, उससे हमें सतर्क होना चाहिए। हम नहीं जानते हैं कि इन उत्पादों की उसे वास्तव में आवश्यकता है या फिर वह कोई और योजना बना रहा है”। बी वी मेहता की चिंता का अनुमोदन करते हुए कोच्चि रबर मर्चन्ट्स असोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एन राधाकृष्णन  ने कहा, “हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि कहीं चीन इन उत्पादों को किसी और उद्देश्य से स्टॉक तो नहीं कर रहा है।” 

ऐसे में चीन अपनी वर्तमान नीतियों से ‘रूठे हुए भारत’ को मनाने का भरसक प्रयास कर रहा है। परंतु भारत भी अब पहले जैसा नहीं रहा, और वह चीन की हर चाल को लेकर पहले से सजग और सतर्क है, और यहां चीन की दाल नहीं गलने वाली।

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