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21 November 2020

रिश्वतखोरी में भी है हमारी अच्छी पहचान, पहुंच गये 77 वें पायदान पर

rishwat

 दिल्ली। गुणवत्ता, कायमाबी की रैंकिंग जारी होने पर देश, समाज और व्यक्ति प्रसन्न होता है लेकिन जब भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी की रैंकिंग जारी होती है तो सिर शर्म झूक जाता है। है। रिश्वत रोधी मानक सेटिंग संगठन ने रिश्वतखोरी की रैंकिंग जारी की है। जिसमें भारत 77वें स्थान पर है। वैश्विक स्तर पर रिश्वतखोरी के मामले में भारत 77वें स्थान काबिज हो गया है। गत वर्ष वह एक पायदान नीचे था। बीते साल एक पायदान नीचे था। भारत 45 अंकों के साथ 2020 के व्यापार रिश्वत जोखिमों की वैश्विक सूची में 77वें स्थान पर पहुंच गया है। रिश्वत रोधी मानक सेटिंग संगठन टीआरएसीई की सूची में 194 देशों, क्षेत्रों और स्वायत्त और अर्ध-स्वायत्त क्षेत्रों में व्यापार रिश्वत जोखिम को शामिल किया जाता है। संगठन की जारी रैंकिंग में उत्तर कोरिया, तुर्कमेनिस्तान, दक्षिण सूडान, वेनेजुएला और इरीट्रिया सबसे अधिक व्यापारिक रिश्वत जोखिम वाले देश हैं। जबकि डेनमार्क, नॉर्वे, फिनलैंड, स्वीडन और न्यूजीलैंड में यह सबसे कम है। वर्ष 2019 में भारत 48 अंकों के साथ 78वें स्थान पर था जबकि 2020 में 45 अंकों के साथ यह 77 वें स्थान पर है।

रिश्वतखोरी की रैंकिंग चार कारकों पर आधारित होते हैं, जिनमें सरकार के साथ व्यापारिक बातचीत, रिश्वत प्रतिरोधक और प्रवर्तन, सरकार और सिविल सेवा पारदर्शिता, तथा मीडिया की भूमिका सहित नागरिक संगठन निगरानी क्षमता शामिल हैं। जारी रैंकिंग में भारत का प्रदर्शन अपने पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बांग्लादेश से बेहतर है। हालांकि भूटान ने 37 अंकों के साथ 48 वां स्थान प्राप्त किया है। टीआरएसीई ब्राइबरी रिस्क मैट्रिक्स’ ने कहा कि चीन द्वारा अपनी नौकरशाही में सुधार करने से लोक अधिकारियों के रिश्वत मांगने के अवसरों में कमी आयी है।

भारत के अलावा, पेरू, जॉर्डन, उत्तरी मैसिडोनिया, कोलंबिया और मोंटेनेग्रो को भी 45 अंक मिले हैं। इस रैंकिंग में प्रत्येक देश को 1 से 100 तक नंबर दिए जाते हैं। यदि किसी देश को उच्च स्कोर मिलता है, तो इसका मतलब है कि यह व्यापार रिश्वतखोरी का अधिक जोखिम है। 2014 में यह 94वें स्थान पर था। इस वैश्विक रिश्वतखोरी की रैंकिंग जारी होने पर दुनिया के देश पूंजी लगाने और निवेश करने के दौरान आकलन करते हैं। रिश्वतखोरी के आधार आंकलन में समाज के सभी अंग शामिल दिखते हैं। दुनिया के देश प्रतिवर्ष संगठन की इस रैंकिंग को देखते हैं लेकिन सुधार करने में नाकामयाब हैं। इस रिश्वतखोरी का असर जनता पर सीधे पड़ता है।

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