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06 October 2020

न्यू कैलेडोनिया से शुरू हो सकता है चीन के खिलाफ QUAD और फ्रांस का गठजोड़


New Caledonia- ऑस्ट्रेलिया के पूर्व में स्थित यह पेसिफिक द्वीप वैसे तो पिछले 170 सालों से फ्रांस के अधीन रहा है, लेकिन हाल ही में हुए जनमत संग्रह से यह स्पष्ट हो चुका है कि इस द्वीप पर फ्रांस की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। 1980 के दशक में फ्रांस से आज़ादी के लिए इस द्वीप पर भड़की हिंसा के बाद वर्ष 1998 में फ्रांसीसी सरकार और अलगाववादी संगठनों के बीच Noumea Accord पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसके तहत New Caledonia के लोगों को फ्रांस से आज़ाद होने के लिए तीन-तीन मौके दिये हैं। इसी संधि के तहत इस द्वीप पर वर्ष 2018 में भी जनमत संग्रह हो चुका है, जहां करीब 57 प्रतिशत वोटर्स ने फ्रांस के साथ रहने के लिए ही वोट दिया था। इस साल के जनमत संग्रह में फ्रांस के लिए चिंताएँ इसलिए बढ़ गयी हैं क्योंकि सिर्फ 53 प्रतिशत लोगों ने ही फ्रांस के साथ रहने के लिए वोट किया है। संधि के तहत वर्ष 2022 में एक और आखिरी जनमत संग्रह होना है, और अगर फ्रांस ने जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए, और वह अगले संग्रह में इस प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर द्वीप को खो सकता है।

फ्रांस के लिए यहां मुश्किलें इसलिए भी बढ़ चुकी हैं क्योंकि चीन पिछले कुछ सालों से इस द्वीप पर आर्थिक प्रभुत्व बढ़ाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। Nickel Deposits से भरपूर यह द्वीप अपना अधिकतर export चीन को ही करता है। वर्ष 2018 में New Caledonia ने 1 बिलियन डॉलर से ज़्यादा एक्सपोर्ट केवल चीन को ही किया था। चीन के साथ बढ़ते आर्थिक रिश्तों के कारण पेसिफिफ क्षेत्र में इस द्वीप की GDP per Capita सर्वाधिक है, जो कि वर्ष 2018 में 38,270 डॉलर थी। वर्ष 2018 में जनमत संग्रह के नतीजे आने के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति Macron ने इस द्वीप पर बढ़ते चीनी दख्ल को लेकर चिंता भी जताई थी। वर्ष 2018 में Macron ने इस द्वीप की यात्रा के दौरान कहा था “चीनी यहाँ धीरे-धीरे अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं। यह हमारी स्वतन्त्रता को खतरे में डाल देगा। यह हमारे लिए अवसरों को कम कर देगा”। बता दें कि चीन धीरे-धीरे पेसिफिक द्वीपों पर अपनी पकड़ को मजबूत करता जा रहा है, और उसकी लगातार कोशिशों के कारण ही आज क्षेत्र के 14 में से 10 द्वीप ताइवान के वजूद को नकारकर आधिकारिक तौर पर चीन को मान्यता प्रदान करते हैं।

यहाँ तक कि New Caledonia के फ्रांस समर्थक कार्यकर्ता भी यही दावा करते हैं कि यदि एक बार इस द्वीप को फ्रांस से अलग कर दिया गया, तो हम सब चीन के गुलाम बन जाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि चीन पहले भी कई द्वीपों के साथ ऐसा ही कर चुका है। उदाहरण के लिए 80 के दशक में फ्रांस और UK से अलग हुए Vanuatu द्वीपों पर आज चीन का आर्थिक कब्जा हो चुका है, जहां उसने भारी निवेश किया हुआ है। इसी प्रकार अगर New Caledonia फ्रांस से आज़ाद होने की भूल करता है तो वह दिन दूर नहीं होगा जब चीन अपने आर्थिक प्रभुत्व का इस्तेमाल कर इस द्वीप को अपनी मुट्ठी में करने की कोशिश करना शुरू कर देगा।

फ्रांस के राष्ट्रपति “चीनी समस्या” से लड़ने के लिए वर्ष 2018 में ही ऑस्ट्रेलिया और भारत के साथ मिलकर यहाँ चीनी प्रभाव को कम करने की बात कह चुके हैं। पेसिफिक में बढ़ते चीनी प्रभाव के कारण ना सिर्फ ऑस्ट्रेलिया बल्कि Quad के हितों को गहरा नुकसान पहुंचेगा। ऐसे में फ्रांस के लिए इस क्षेत्र में Quad के साथ मिलकर काम करने का अच्छा विकल्प मौजूद है। फ्रांस पहले ही Indo pacific में नई दिल्ली- कैनबरा- पेरिस के गठजोड़ की बात कर चुका है, और New Caledonia में बढ़ते चीनी दख्ल को देखते हुए फ्रांस अब खुलकर Quad के साथ Indo-pacific में मिलकर काम सकता है, अन्यथा वह ना सिर्फ रणनीतिक तौर पर अहम इस द्वीप को खो देगा, बल्कि यहाँ चीन के बढ़ते दख्ल के कारण ऑस्ट्रेलिया और New Zealand जैसे लोकतान्त्रिक देशों के लिए बड़ी चुनौती भी खड़ी हो सकती है।

बता दें कि इस द्वीप पर चीनी प्रभाव को चुनौती देने के लिए भारत यहाँ पहले ही निवेश करने की घोषणा कर चुका है। इसके अलावा अगर Quad के बाकी देश मिलकर यहाँ के लोगों को चीनी निवेश के विकल्प के तौर पर बेहतर infrastructure और आर्थिक अवसर प्रदान करें, तो भी यहाँ चीन के प्रभुत्व को कम किया जा सकेगा। फ्रांस Indian Ocean में Reunion और Mayotte द्वीपों का नियंत्रण करता है तो वहीं, पेसिफिक में New Caledonia के अलावा French Polynesia भी उसी के नियंत्रण में है, और यहाँ फ्रांस की सैन्य मौजूदगी भी है। ऐसे में अगर फ्रांस Indo-pacific में Quad के साथ मिलकर काम करने की योजना बनाता है तो ना सिर्फ Quad को फ्रांस की मजबूत नौसेना का साथ मिलेगा, बल्कि फ्रांस के लिए भी चीन से निपटना आसान हो जाएगा। New Caledonia पर टिकी चीन की बुरी नज़र के कारण अब फ्रांस भी आधिकारिक तौर पर Quad के साथ मिलकर काम करने वाला है, जो चीन के लिए किसी भी सूरत में अच्छी खबर नहीं है।

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