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06 October 2020

पटना कभी दुनिया का Las Vegas था, अब यहाँ न शराब है और न राजस्व

 


बिहार में शराबबंदी को लेकर बनाए गए कानून के बाद शराब पीकर अपराध करने वालों की संख्या में भारी कमी आई है जिससे जनता खुश है । शराब और उसके जरिए राजस्व को यहां की एक ऐतिहासिक विरासतों में से एक माना जाता है। शराब से राज्य सरकारें सबसे ज्यादा रेवेन्यू कमाती हैं लेकिन बिहार में बंदी के बाद यहां के रेवेन्यू में बड़ी गिरावट आ गई है। आज स्थिति ये है कि शराब की विरासत से धन अर्जित करने वाला ये राज्य अब गरीब राज्यों की श्रेणी में आ गया है, ऐसी स्थितियों के बावजूद बिहार सरकार की सख्ती बताती है कि राजस्व के नाम पर वो शराब की बिक्री को कोई मंजूरी नहीं देने वाले हैं।

भारत में राजनीति की ऐसी स्थिति है कि सरकारें तभी कोई निर्णय लेती हैं जब उन्हें उस निर्णय से वोटों की संभावना न दिखे। बिहार में नीतीश सरकार द्वारा 2016 में ताड़ी समेत सभी तरह की शराब को बैन कर दिया गया था। गौरतलब है कि कम एल्कोहल वाली ताड़ी को बैन करके सरकार ने ये भी जाहिर कर दिया है कि वो इसके लिए प्रतिबद्ध है।

पटलिपुत्र की विरासत शराब

शराब का इतिहास मौर्य साम्राज्य के दौर का है जिसके कारण पटना को ऐतिहासिक लास वेगास कहा जाता है। जिस तरह आज के दौर में वेगास शराब के लिए जाना जाता है, एक वक्त पटना जाना जाता था। भारतीय इतिहास के बड़े नीतिकार चाणक्य उस दौर में शराब की बिक्री औऱ खपत को नियंत्रित करते थे और वो चंन्द्रगुप्त के शासन के दौरान प्रधानमंत्री थे। किताब ‘A short history of India’s drinking culture’ के लेखक मगनदीप ने इसको लेकर कहा है कि उस दौरान पहली बार ऐसा हुआ था कि शराब पर टैक्स जोड़ा गया था जिसके जरिए बड़ा राजस्व कमाया जा सके। इसके पीछे चाणक्य की नीति थी।

बैन होने के बाद से ही जहां इस फैसले को लेकर उनकी तारीफ हो रही है तो दूसरी ओर राज्य के राजस्व में लगातार कमी होती जा रही है। कोरोनावायरस के कारण लॉकडाउन खुलने के बाद सबसे पहले राज्यों ने शऱाब की ही दुकानें खुलवाईं जिससे राजस्व में तत्कालिक इजाफा हो सके। पूरे देश में खूब शराब बिकी, लेकिन बिहार शांत था क्योंकि शराब तो बैन थी न… कई विश्लेषकों ने इसको लेकर बयान भी दिए कि राजस्व की कमी के बुरे वक्त में शराब से पाबंदी हटाई जानी चाहिए, लेकिन सरकार अपने फैसले पर अटल थी। आज स्थिति ये है कि बिहार में शराब का नामोंनिशान नहीं है। ये वैसा ही कि जैसे वेगास में शराब की खपत का कम हो जाना। चाणक्य द्वारा बनाई गई शराब के राजस्व की नीति बिहार में अब खत्म हो चुकी है।

बिहार में शराब बंदी के बाद अब राज्य को हर वित्त वर्ष में करीब 4 से 5 हजार करोड़ का घाटा हो रहा है। पिछले 4 सालों में बिहार शराब बंदी के बाद से लगभग 20 हजार करोड़ का नुकसान झेल चुका है और ये नुकसान बिहार के राजस्व में अतिरिक्त भार डाल रहा है। इसके कारण ये भी कहा जाने लगा है कि बिहार में इन्फ्रास्ट्रकचर के कार्यों में कमी में कमी होने की बड़ी वजह शराब बंदी और राजस्व की कमी है। बिहार में गठबंधन सरकार के बावजूद दोनों ही दल इस शराब बंदी से खुश हैं।

बिहार में शराब बंदी का एक और बड़ा फायदा उसके पड़ोसी राज्यों यूपी, एमपी, बंगाल के लिए लेकर आई है, क्योंकि इन राज्यों से लगातार शराब की तस्करी बिहार के लिए की जाती है, जिससे बिहार में चोरी छिपे दोगुने दामों पर शराब बेची जाती है। उसके बदले न केवल तस्करों का फायदा होता है बल्कि राज्य सरकारों की भी मोटी कमाई होती है। यही नहीं बिहार में बिना किसी रणनीति के तहत शराब बंदी की गई और उसके चलते ही वहां की अदालतों में नए शऱाब से जुड़े केसों की संख्या में बारी बढ़ोत्तरी हुई है और न्यायिक प्रक्रिया पर भी अतिरिक्त और अप्रत्याशित बोझ पड़ा है।

बहरहाल स्थिति ये है कि जो राज्य शराब की विरासत के लिए जाना जाता था और वहां शराब बैन होने के बावजूद राजस्व को लेकर ज्यादा सरकार बिल्कुल भी चिंतित नहीं है, और शराब यहां बस केवल एक विरासत के रूप में ही दर्ज है।

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