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07 October 2020

मनोरंजन का साधन बन चुके हैं समाचार चैनल, लोगों का टूट रहा है विश्वास

 

नई दिल्ली। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला भारतीय मीडिया अब भरोसेमंद नहीं रह गया है। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए प्रतिष्ठित चैनलों ने न्यूज की जगह फेंक न्यूज को ज्यादा महत्व देना शुरू कर दिया है। कोरोना संकट के दौरान भारत के नए मीडिया का जो नया स्वरूप देखने को मिला है वह बेहद हैरान करने वाला है। लोग 74 प्रतिशत भारतीय समाचार चैनलों को खबरों की जगह मनोरंजन का एक जरिया समझने लगे हैं। इन लोगों का कहना है कि न्यूज चैनल अब वास्तविक खबर दिखाने की जगह मनगढ़ंत व फेंक न्यूज के जरिए मनोरंजन करा रहे हैं। आईएएनएस सी-वोटर मीडिया कंजम्पशन ट्रैकर के हाल में कराए गए एक सर्वे में यह सच्चाई सामने आई है।

कोरोना संकट के दौरान सामाजिक दूरी और राष्ट्रव्यापी बंद के चलते सामान्य मनोरंजन चैनलों की उत्पादन क्षमता को भी प्रभावित किया है। सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है और इसी के चलते ‘ताजा’ रचनात्मक सामग्री के अभाव में भी दर्शकों ने एक रियलिटी शो के रूप में न्यूज कवरेज का रुख किया। सर्वेक्षण के दौरान राज्यों के सभी जिलों से आने वाले 5000 से अधिक उत्तरदाताओं से चर्चा की गई है। वर्ष 2020 में यह सर्वेक्षण सितंबर के आखिरी सप्ताह और अक्टूबर के पहले सप्ताह के बीच किया गया है।

सर्वेक्षण में शामिल लोगों से जब यह सवाल किया गया कि क्या वह इस बात को मानते हैं कि भारत में न्यूज चैनल समाचार परोसने की अपेक्षा अधिक मनोरंजन पेश करते हैं। इस पर 73.9 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अपनी सहमति जताई। इस सर्वेक्षण में शामिल लोगों के जवाब से पता चला कि अधिकतर दर्शक समाचार चैनलों को टीवी पर आने वाले धारावाहिक के तौर पर देखते हैं। यानी वह खबर और सीरियल दोनों को एक ही एंगल से देखते हैं। देश के 76.6 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना था कि टीवी धारावाहिक और टीवी समाचार चैनल सभी चीजों को सनसनीखेज बनाने की कोशिश करते हैं। खैर 20 प्रतिशत लोग इस बात से असहमत भी मिले।

डिबेट के नाम पर चीखना-चिल्लाना

सर्वे में पाया गया कि डिबेट की गंभीरता खत्म हो गई है। क्योंकि अधिकतर लोगों का कहना है कि न्यूज चैनलों पर दिखाई जाने वाली सामग्री में गंभीरता का आभाव है और वहां उचित बहस की जगह अनावश्यक तौर से लोगों झगड़े देखने को मिलते हैं। देश के 76 प्रतिशत लोगों को मानना है कि समाचार चैनलों पर सार्थक बहस (डिबेट) न होकर अनावश्यक नोकझोंक होता है। उत्तरदाताओं ने माना कि टेलीविजन डिबेट में तथ्यात्मक बातों से हटकर हवा—हवाई बातों पर ज्यादा बहस होती है।.

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