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Thursday, October 29, 2020

चौड़ी पत्ते वाले सभी पेड़ पौधों का संरक्षण बहुत जरूरी है जानते हो क्यों ??

 

देवभूमि उत्तराखंड में दिन प्रतिदिन जल स्रोतों में निरन्तर कमी आते जा रही है । गाँवों के पारम्परिक जल स्रोतों जैसे नौले धारे अधिकतर या तो सूख चुके हैं या सूखने की कगार पर हैं। अधिकतर गधेरों में भी अब पानी ना के बराबर रह गया है कुछ सूख चुके हैं और कुछ सूखने की कगार पर हैं।

बारिश हुई तो बरसात का पानी कही कही दिखायी देता है, नहीं तो कई वर्षों से गधेरों में बरसात में भी पानी नहीं दिख पा रहा है, पानी के छोटे छोटे तालाब जिन्हें उत्तराखंड में खाल के नाम से जाना जाता है वे भी सूख चुके हैं और हाँ इतना जरूर है कि गधेरों में पुलों का निर्माण कार्य या तो पूरा कर लिया गया है या हो चुका है, जबकि पानी उन गधेरों में ना के बराबर रह चुका है।

इन प्राकृतिक जल स्रोतों के सूखने पर यदि अब भी चर्चा या विचार नहीं किया गया तो बहुत देर हो जाएगी , हमारे देश में सड़कों का जाल दिन प्रतिदिन बिछते जा रहा है या सड़को का जाल बिछ चुका है । ऑल वैदर रोड़ आजकल पूरे देश में बनाई जा रही है, जिस कारण लाखों वृक्षों को काटा जा रहा है, पेड़ों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होते जा रही है वृक्षारोपण के नाम पर हर साल बकायदा महोत्सव आयोजित होते हैं लाखों पेड़ लगते हैं किन्तु उनकी देख रेख के नाम पर कोई भी आगे नहीं आता पेड़ो के नाम पर उनकी सुरक्षा के लिए कोई भी कार्यक्रम नहीं किया जाता है।

बड़े लोग पेड़ लगाते हुए फोटो खिंचवाकर खुश होते हैं, परन्तु पेड़ लगाने के बाद पेड़ कही आदमी कही पेड़ बच गया तो ठीक नहीं तो अगले साल फिर वृक्षारोपण किया जाएगा ऐसा करते करते काफी समय निकल चुका है।

जंगलों में आग लगती है या ये कहें कि लकड़ी तस्करों द्वारा लगायी जाती है, जिस कारण पर्यावरण को भारी नुकसान होते आ रहा है। जंगलों में आग बुझाने के नाम पर सरकारी स्तर पर बजट का प्रावधान जरूर है मगर इस बजट का खर्च करना मुख्य उद्देश्य रह जाता है।

जिन लोगों के जंगल हैं उनको जंगलों से जोडने का प्रयास नहीं हुआ है।

बताते हैं कि पहले गांव के जंगल देवता के नाम पर होते थे, लोग जंगलों के बचाव स्वयं करते थे। आग लगने पर गाँव वाले आग बुझाने का काम करते थे। जब करोड़ों रुपये सरकार आग बुझाने पर खर्च करती है लोग तटस्थ रहते हैं।

अगर ये ऐसे ही चलते गया तो एक दिन जंगल समाप्ति की कगार पर आ जाएंगे। पहाड़ो में चौड़ी पत्ती के पेड़ जहां पर्यावरण को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे हैं, आज जरुरत है कि पहाड़ों में चौड़ी पत्तियों वाले पेड़ों और पौधों का अत्यधिक मात्रा में रोपण किया जाए अन्यथा एक समय ऐसा आएगा जब हम पीने के पानी को भी तरस जाएंगे सक्षम लोग तो बाजार से पानी के बन्द बोतल खरीद लेंगे,पर गरीब के दिन कैसे गुजरेंगे? ये बात चिन्तन करने वाली है।

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