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08 October 2020

पुतिन चाहते हैं चीन का खात्मा पर ये काम वह खुद नहीं करेंगे


रूस और चीन के आपसी संबंध हमेशा से ही Geopolitics में रूचि रखने वाले विश्लेषकों के लिए सबसे रूचिकर विषय रहा है। ये दोनों कम्युनिस्ट देश एक दूसरे के सबसे करीबी दोस्त होने का दिखावा ज़रूर करते हैं, लेकिन असल में इन दो देशों से ज़्यादा आपसी दुश्मनी शायद ही कहीं और देखने को मिले। उदाहरण के लिए अज़रबैजान-आर्मीनिया विवाद में सीधे तौर पर हस्तक्षेप ना करके रूस (Russia)  ने यह साफ संकेत दिया है कि वह दक्षिण Caucasus क्षेत्र में एक बड़ी जंग कर दुनिया का ध्यान चीन से नहीं हटाना चाहता है। रूस (Russia)  लगातार आर्मीनिया-अज़रबैजान विवाद में पानी डालने की कोशिश कर रहा है, ताकि यहां विवाद भड़कने से दुनियाभर में बन रही चीन विरोधी हवा में कोई विघटन पैदा न हो। इससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि रूस आज के दौर में चीन के लिए एक “Silent Killer” के रूप में काम कर रहा है, जो सीधे तौर पर किसी विवाद में शामिल ना होकर चुपके-चुपके चीन के हितों के खिलाफ काम कर रहा है।

हाल ही में एक इंटरव्यू में पुतिन ने यह साफ किया कि रूस (Russia)  बेशक CSTO के तहत आर्मीनिया की संप्रभुता की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन Nagorno-Karabakh क्षेत्र दो देशों के बीच एक विवादित क्षेत्र है, और यहाँ रूस आर्मीनिया की रक्षा के लिए बाध्य नहीं है। पुतिन ने यह भी कहा कि वे दोनों पक्षों के बीच चल रहे इस विवाद को जल्द से जल्द खत्म होते देखना चाहते हैं। यानि साफ है कि आर्मीनिया विवाद में कूदने को लेकर रूस अभी दूर-दूर तक भी रूचि नहीं ले रहा है। अगर रूस यहां विवाद को भड़का देता और एक जंग छेड़ देता, तो यह बेशक चीन को फायदा पहुंचाता। पिछले महीने में ही रूस ने अपने सुदूर पूर्वी इलाके में चीनी बॉर्डर के पास अपनी सेना की तैनाती को बढ़ाने का फैसला लिया था, इसके अलावा इसी हफ्ते में जापान के Tokyo में QUAD देशों के विदेश मंत्रियों ने बैठक कर चीन को घेरने का प्लान बनाया है। ऐसे वक्त में जब दुनिया की सभी बड़ी शक्तियों का सारा फोकस चीन पर है, तो रूस ने एक अलग विवाद को ना भड़काकर इस चीन विरोधी मुहिम को बल देने का काम किया है।

कहने को तो रूस और चीन कई स्तर पर एक दूसरे का “सहयोग” करने का दावा करते हैं। उदाहरण के लिए दोनों देशों ने हाल ही में Kavkaz सैन्य अभ्यास में हिस्सा लिया था। इसके अलावा दोनों देश SCO और BRICS का भी हिस्सा हैं। रूस आधिकारिक तौर पर BRI का भी हिस्सा है। हालांकि, रूस में BRI के तहत चीन का कोई भी प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पा रहा है। रूस भारत-चीन के विवाद के दौरान भी भारत का ही पक्ष लेता दिखाई दे रहा है। रूस (Russia) ने एक तरफ जहां चीन को S400 की मिसाइलों की सप्लाई रोक दी, तो वहीं भारत के साथ उसने एक आपात सैन्य करार कर लिया।

सके साथ ही रूस अपने Far East में चीन को चुनौती देने के लिए भारत की सहायता ले रहा है, जो जापान के साथ मिलकर वहाँ निवेश बढ़ाने की बात कह चुका है। यानि रूस (Russia) अपने स्तर पर तो चीन के खिलाफ ना कोई बड़ा कदम उठा रहा है और ना ही उसके साथ विवाद को भड़का रहा है, लेकिन चुप-चाप रहकर अपने far east में चीन के दो बड़े दुश्मनों, यानि भारत और जापान को जगह दे रहा है, जो बिलकुल भी चीन के हित में नहीं है। शायद यही कारण था कि कुछ दिनों पहले चीनी मीडिया ने इशारों ही इशारों में रूस को धमकी भी जारी की थी।

Global Times के मुख्य संपादक हु शीजीन ने अपने एक लेख में लिखा था “रूस और चीन, दोनों देश ही अमेरिका के प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। ऐसे समय में दोनों देशों को एक दूसरे के नजदीक ही रहना होगा। साथ ही रूस-चीन के अच्छे रिश्तों का सबसे बड़ा फायदा रूस को ही हो रहा है। चीन के विकास के साथ ही चीन के साथ अच्छे संबंध रखना अब रूस की ज़रूरत बन गया है।” इस लेख में यह भी बताया गया था कि रूस (Russia) द्वारा भारत की सहायता करने के कारण बड़े पैमाने पर चीन के लोग रूस (Russia) से नाखुश हैं। आमतौर पर अपने लोगों के जज़्बात चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए कोई महत्व नहीं रखते हैं, लेकिन इस बात को प्रकाशित कर चीनी मीडिया ने रूसी सरकार को यह संकेत दिया था कि भारत के साथ उसकी नजदीकी चीन-रूस के सम्बन्धों में खटास पैदा कर सकती है।

रूस बातचीत की मेज़ पर तो चीन का सबसे अच्छा दोस्त होने का नाटक करता है, लेकिन वह मेज़ के नीचे हर वह काम करता है, जो रूस के हितों को नुकसान पहुंचाता हो। यहाँ चीन के लिए मुश्किलें बेहद ज़्यादा इसलिए हो जाती हैं क्योंकि ना तो वह खुलकर रूस पर विश्वास कर सकता है और ना ही वह खुलकर रूस का विरोध ही कर सकता है। रूस (Russia) चीन के पड़ोस में बैठकर बड़ी ही शांति से उसके सारे दुश्मनों को सशक्त करे जा रहा है, और चीन चाहकर भी उसके खिलाफ एक शब्द नहीं बोल सकता।

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