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26 September 2020

गाँधी जयंतीः क्या है गाँधी-इरविन समझौता जिसकी हरदम चर्चा होती रहती है?

इस वर्ष महात्मा गाँधी की 151वीं जयंती मनाई जा रही है यानी की पूरे डेढ़ दशक पहले महात्मा गाँधी का जन्म इस भारत की भूमि पर हुआ था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि साल दर साल चाहे जितने भी वर्ष बीतते चले जायें गाँधी-इरविन समझौता हमेशा ही लोगों के बीच चर्चा का केन्द्र बिन्दु बना रहता है। तो चलिए आज हम आपको गाँधी-इरविन समझौता के बारे में बताते हैं।
मालूम हो कि 5 मार्च, सन् 1931 को लंदन द्वितीय गोल मेज सम्मेलन के पूर्व महात्मा गांधी और तत्कालीन वाइसराय लार्ड इरविन के बीच एक राजनैतिक समझौता हुआ जिसे हम गांधी-इरविन समझौता कहते हैं। आपको बता दें कि चूँकि ब्रिटिश सरकार प्रथम गोलमेज सम्मेलन से समझ गई कि बिना कांग्रेस के सहयोग के कोई फैसला संभव नहीं है। वायसराय लार्ड इरविन एवं महात्मा गांधी के बीच 5 मार्च 1931 को गाँधी-इरविन समझौता सम्पन्न हुआ।
इस समझौते में लार्ड इरविन ने स्वीकार किया कि-
हिंसा के आरोपियों को छोड़कर बाकी सभी राजनीतिक बन्दियों को रिहा कर दिया जाएगा। भारतीयों को समुद्र किनारे नमक बनाने का अधिकार दिया जाएगा। भारतीय शराब एवं विदेशी कपड़ों की दुकानों के सामने धरना दे सकते हैं। आन्दोलन के दौरान त्यागपत्र देने वालों को उनके पदों पर पुनः बहाल किया जायेगा। आन्दोलन के दौरान जब्त सम्पत्ति वापस की जाएगी।
कांग्रेस की ओर से गांधीजी ने निम्न शर्तें स्वीकार की-
सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया जाएगा। कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी। कांग्रेस ब्रिटिश सामान का बहिष्कार नहीं करेगी। गाँधीजी पुलिस की ज्यादतियों की जाँच की माँग छोड़ देंगे। यह समझौता इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पहली बार ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के साथ समानता के स्तर पर समझौता किया।
समझौते में हुयी थी गाँधी का भारी आलोचनाः
इस समझौते को गाँधी जी ने अत्यन्त महत्व दिया, परन्तु जवाहरलाल नेहरू एवं सुभाषचन्द्र बोस ने यह कहकर मृदु आलोचना की कि गाँधी जी ने पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य को बिना ध्यान में रखे ही समझौता कर लिया। के.एम. मुंशी ने इस समझौते को भारत के सांविधानिक इतिहास में एक युग प्रवर्तक घटना कहा। युवा कांग्रेसी इस समझौते से इसलिए असंतुष्ट थे, क्योंकि गाँधी जी तीनों क्रान्तिकारियों भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को फाँसी के फंदे से नहीं बचा सके। इन तीनों को 23 मार्च, 1931 ई. को फाँसी पर लटका दिया गया था।

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