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20 October 2020

‘बंगाल में राष्ट्रपति शासन की मांग गलत नहीं’, अमित शाह के इस बयान के संकेत क्या हैं?

 


हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने न्यूज़ 18 के साथ एक अहम साक्षात्कार में इस मांग को अनाधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगना चाहिए। उन्होंने इस ओर इशारा किया कि पश्चिम बंगाल की स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार परिस्थितियाँ और बंगाली राज्यपाल के सुझावों के आधार पर आगे निर्णय लेगी। अगर बंगाल के वर्तमान परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाये, तो अमित शाह के इस बयान के पीछे कई कारण हैं जिसका हम विश्लेषण करेंगे।

न्यूज़ 18 के संवाददाता ने जब यह पूछा कि बंगाल बीजेपी के नेताओं द्वारा राज्य में राष्ट्रपति शासन की मांग के बारे में वे क्या सोचते हैं, तो शाह ने स्पष्ट कहा कि पॉलिटिकल पार्टी के नेता जो वहां पर काम कर रहे हैं स्थिति के हिसाब से उनकी मांग उचित है।

अमित शाह के अनुसार, भाजपा आदि विपक्षी राजनीतिक दलों को वहां राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की मांग करने का पूरा अधिकार है। केंद्र सरकार इस बारे में संविधान और राज्यपाल जगदीप धनखड़ की रिपोर्ट के आधार पर उचित निर्णय लेगी। हम आशा करते हैं कि अगले साल विधानसभा चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल में सरकार बदलेगी और भाजपा सत्ता में आकर सरकार का गठन करेगी। हम समझते हैं कि हम पश्चिम बंगाल में एक दृढ़ लड़ाई लड़ेंगे और हम सरकार गठित करेंगे”

अमित शाह के बयानों पर गौर करें तो जबसे 2016 में ममता बनर्जी सत्ता में वापिस आई हैं, बंगाल में हिंसा, भ्रष्टाचार और घोटालों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। स्वयं अमित शाह ने इस पर प्रकाश डालते हुए अपने साक्षात्कार में कहा थाराज्य में कानून व्यवस्था तितर बितर हो चुकी है। बम बनाने के कारखाने हर जिले में सामने आ रहे हैं। लोकतन्त्र के लिए यहाँ इस समय सबसे चिंताजनक बात यह है कि विपक्ष के नेताओं की दिन दहाड़े यहाँ हत्या की जा रही है। भारत के किसी और राज्य में ऐसा नहीं होता, केरल में भी नहीं”। 

यहाँ अमित शाह का इशारा बंगाल में दिन प्रतिदिन बंगाली प्रशासन के बढ़ते अत्याचारों की ओर था, जिसका हाल ही में एक घिनौना उदाहरण तेजस्वी सूर्या के नेतृत्व में भाजपा को देखने को मिला जब बीजेपी नेताओं की हत्याओं के खिलाफ बीजेपी ने नाबोनो चलो आंदोलन किया गया। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं पर कोलकाता पुलिस और टीएमसी के गुंडों ने हर प्रकार से हमला किया। आँसू गैस, लाठीचार्ज, रसायन का हमला, देसी बम फेंकना, आप बस बोलते जाइए और बंगाली प्रशासन ने वो सब किया। तेजस्वी सूर्या के काफिले पर अनेकों बार टीएमसी के गुंडों ने देसी बम फेंके, जिससे तेजस्वी बाल बाल बचे।

अगर 2019 के बंगाल लोकसभा चुनाव पर ध्यान दिया जाये, तो अमित शाह द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के संकेत देना स्वाभाविक भी है, और आवश्यक भी। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान जगह-जगह पोलिंग बूथ पर तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने गुंडई की, फर्जी वोट डलवाए, और विरोध करने पर हाथापाई से लेकर हत्याएँ तक की।

इसके अलावा ममता बनर्जी ने जय श्री राम के नारे लगाना तो मानो एक अक्षम्य अपराध घोषित कर दिया। कई राहगीरों और भाजपा कार्यकर्ताओं को केवल इसलिए जेल में डाला गया, क्योंकि उन्होने ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। उदाहरण के लिए 2019 के चुनाव प्रचार के दौरान

ममता बनर्जी जब आरामबाग सीट के चंद्रकोण क्षेत्र में एक जनसभा को संबोधित करने के लिए जा रही थीं, तो उस दौरान उनका सामना जय श्री राम के नारों के साथ हुआ। उनकी गाड़ी जैसे ही शहर में घुसी, तो सड़क किनारे खड़े कुछ लोग भगवान श्रीराम के नारे लगाने लगे।

इसके बाद ममता अपनी गाड़ी से उतरी और नारे लगाने वाले लोगों को यह कहकर धमकाया कि चुनावों के बाद भी उन्हें यहीं रहना है। हालांकि, जब इस मामले पर विवाद गहराने लगा तो ममता ने यह सफाई दी कि कुछ भाजपा के कार्यकर्ता उनके साथ गाली-गलोच कर रहे थे, जिसके बाद उन्होंने उनको धमकाया। इस घटना को लेकर पश्चिम बंगाल भाजपा ने ट्वीट कर ममता पर यह आरोप लगाया है कि अब उन्हें जय श्री राम के नारे में भी गाली नज़र आती है।

लेकिन इतने प्रपंच के बावजूद भारतीय जनता पार्टी 42 सीटों में से 18 सीटों पर विजयी होने में कामयाब रही और उन्होंने पश्चिम बंगाल में प्रमुख विपक्षी पार्टी का दर्जा प्राप्त किया। परंतु जिस प्रकार ‘नाबोनो चलो’ अभियान के दौरान भाजयुमो अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या पर घातक हमला हुआ, उसे देखने के बाद ये पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने पर गृह मंत्री द्वारा किया जा रहा विचार सही नजर आता है. यदि चुनाव में निष्पक्षता के साथ विजयी होना है, तो कुछ कड़े कदम उठाने ही पड़ेंगे, और ये राष्ट्रपति शासन के बिना संभव नहीं है।

ऐसे में जिस प्रकार से अमित शाह ने संकेत दिया है कि राष्ट्रपति शासन बंगाल में चुनाव से पहले लग सकता है, उससे स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की गरिमा को बनाये रखने के लिए और निष्पक्षता से चुनाव संपन्न करवाने के लिए ये आवश्यक है ताकि ममता बनर्जी चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालने में सफल न हो सकें।

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