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27 September 2020

अपनी वैक्सीन को प्रोमोट करने और रूसी वैक्सीन को बर्बाद करने के लिए चीन WHO का इस्तेमाल कर रहा है

 


WHOWHO

जब से कोरोना महामारी शुरू हुई है, तब से ही विश्व के कई देशों में इस वायरस के लिए वैक्सीन बनाने की एक होड़ शुरू हो गयी थी। सबसे पहले चीन ने कई दावे किए उसके बाद रूस ने भी वैक्सीन बना लेने का दावा किया था। अब यह होड़ इतनी बढ़ चुकी है कि चीन एक बार फिर से अपनी वैक्सीन को प्रमोट करने तथा रूस द्वारा निर्मित वैक्सीन की विश्वसनीयता को कमतर करके दिखाने के लिए WHO की मदद ले रहा है ताकि दुनिया भर के देश कोरोना के लिए वैक्सीन चीन से खरीदे न कि रूस से!

दरअसल,वुहान वायरस से लड़ने योग्य वैक्सीन बनाने हेतु कई देश होड़ में लगे हुए हैं, जिनमें इज़रायल, अमेरिका, इटली, ब्रिटेन इत्यादि जैसे देश शामिल हैं। भारत में भी इस महामारी से लड़ने के लिए दो वैक्सीन तैयार की जा रही है। कुछ दिनों पहले रूस ने कोरोना की वैक्सीन बनाने का दावा किया था जिसे Sputnik V का नाम दिया गया था।

परंतु WHO ने रूस पर ही सवाल उठाते हुए चेतावनी दे डाली और कहा कि अभी वैक्सीन के pre-qualification के विषय में अधिक डेटा नहीं है इसलिए रूस को सावधान रहना होगा जिससे इसके इस्तेमाल से लोगों की जान पर कोई खतरा ना आए। WHO के इस प्रकार से सवाल उठाने के बाद जर्मनी ने भी रूस के वैक्सीन की विश्वसनीयता पर सवाल उठा दिया। रूस की वैक्सीन को विश्व से भी कोई अच्छा रिसपौन्स नहीं मिला, और साथ ही साथ वैश्विक मीडिया में भी रूस की वैक्सीन के खिलाफ लेख लिखे जाने लगे।

अब CNN की रिपोर्ट के अनुसार चीन के एक स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया कि चीन ने अपनी Covid -19 वैक्सीन बनाने के दावेदारों के लिए एक विवादास्पद आपातकालीन कार्यक्रम शुरू करने से पहले WHO का समर्थन प्राप्त कर लिया है।

चीन की सरकार द्वारा चलाये जा रहे इस आपातकालीन कार्यक्रम के तहत जुलाई से ही सैकड़ों हजारों लोगों को प्रायोगिक कोरोनावायरस वैक्सीन दिये जा रहे हैं वो भी उस वैक्सीन की विश्वसनीयता साबित होने या क्लीनिकल ट्रायल से पहले। यह हैरान कर देने वाली बात है कि WHO इस तरह से लोगों के जान से खेलने वाले कार्यक्रम को अपना समर्थन दे रहा है।

यानि एक तरफ WHO नियमों का पालन करते हुए डेटा की कमी होने के कारण रूस की वैक्सीन पर सवाल खड़े करता है, और जो कि सही भी है; तो दूसरी ओर वही WHO चीन को बिना क्लीनिकल ट्रायल के ही वैक्सीन के इस्तेमाल को अपना समर्थन दे रहा है जिससे वो वैक्सीन के इस रेस में आगे निकल जाए।

चीन और WHO की सांठ-गांठ के कई उदाहरण देखने को मिल चुके हैं। ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की रूस के वैक्सीन कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाने के लिए चीन द्वारा WHO पर दबाव बनाया गया होगा, जिसके बाद ही WHO ने Sputnik V के खिलाफ अपना मत रखा! यह शक इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि चीन को लेकर WHO का रवैया एकदम अलग दिखाई दे रहा है।

चीन में इस तरह से बिना किसी क्लीनिकल ट्रायल के कोरोना वैक्सीन के अंधाधुंध इस्तेमाल पर पश्चिम में कुछ विशेषज्ञों और वैक्सीन डेवलपर्स ने वैक्सीन के इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी जारी कर दी है। हालांकि, WHO को यहाँ कोई समस्या नज़र नहीं आ रही है।

पहले तो चीन ने WHO का इस्तेमाल कोरोना महामारी को छुपाने और अपने ऊपर महामारी फैलाने के आरोप लगने से बचाने के लिए किया और अब वैक्सीन वॉर के लिए भी चीन WHO का भरपूर इस्तेमाल कर रहा है। जब से कोरोना महामारी फैली और WHO चीन के बचाव में उतरा, तब से ही चीन और WHO के बीच साँठ-गांठ सामने आई। इस साँठ-गांठ ने कोरोना को एक बीमारी से महामारी में बदलने में पूरी भूमिका निभाई है।

उदाहरण के लिए इस वर्ष जनवरी महीने में WHOने चीन के अधिकारियों पर अंधविश्वास कर यह दावा कर डाला था कि यह वायरस एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में नहीं फैलता है। बाद में जब यह दावा कोरा झूठ साबित हुआ तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चीन के खिलाफ कोई जांच करने की ज़रूरत तक महसूस नहीं की।

कोरोना ने जब तेजी से अपने पांव पसारने शुरु किये तो मई में विश्व स्वास्थ्य सभा में वायरस की उत्पत्ति की जांच के प्रस्ताव का 120 से अधिक देशों ने समर्थन किया। तब विश्व स्वास्थ्य संगठन के डायरेक्टर जनरल डॉ टेडरोस ने सीधे चीन के खिलाफ कुछ नहीं कहा था, केवल जल्द ही इस मामले में अन्य देशों को आगाह करने की बात कही थी।

वहीं चीन ने WHO के माध्यम से सिर्फ अपने आप को कोरोना की ज़िम्मेदारी से बचाने के लिए इस्तेमाल किया है, बल्कि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि चीन ने WHO को अपने आर्थिक फायदे के लिए भी इस्तेमाल किया है। ऐसा इसलिए क्योंकि WHO शुरू से ही कोरोना से निपटने के लिए “टेस्ट-टेस्ट-टेस्ट” का मंत्र सब देशों दे रहा था।

बाकी देशों ने WHO की सलाह मानकर बड़े पैमाने पर टेस्ट किए और टेस्ट करने के लिए चीन से टेस्टिंग किट्स मंगानी शुरू कर दी। चीन ने भी मौके को हाथों-हाथ लपका और स्पेन, इटली, तुर्की, चेक रिपब्लिक जैसे देशों को घटिया क्वालिटी का माल भेजना शुरू कर दिया। कोरोना की टेस्टिंग के लिए स्पेन ने चीन से 6 लाख से ज़्यादा टेस्टिंग किट्स इम्पोर्ट की थी, लेकिन बाद में यह सामने आया कि इन टेस्टिंग किट्स का accuracy level सिर्फ 30 प्रतिशत ही था।

इससे यह कहना गलत नहीं होगा कि चीन की इस वैश्विक संगठन पर बेहद मजबूत पकड़ है जिससे यह मनमर्ज़ी की बयानबाज़ी करवा सकता है। अब ऐसा लग रहा है कि कोरोना के बाद अब वैक्सीन वॉर में भी चीन WHO की मदद ले रहा है और इसी क्रम में WHO ने रूस के द्वारा पहले वैक्सीन बना लिए जाने के कारण उसपर सवाल उठाए थे। इसी बीच चीन अपने वैक्सीन को वैश्विक स्तर पर पुश करता रहा है और कई दक्षिण एशियाई देशों को वैक्सीन बेचने की बात कर रहा है और WHO चीन को वैक्सीन बनाने और उसके ट्रायल में समर्थन कर उसकी मदद कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह चीन की चाल है जिससे वह WHO की मदद से वह रूस के वैक्सीन को डंप करवाने पर तुला हुआ है और अपनी वैक्सीन को स्वीकृति दिलवाने की दिशा में काम कर रहा जिससे सभी देश रूस के बजाए उससे वैक्सीन खरीदें, और चीन सफलतापूर्वक अपनी vaccine diplomacy को अंजाम दे सके।

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