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01 September 2020

सौ साल बाद भी नहीं बदले हालात, आज भी वैश्विक महामारी के आगे बेबस है दुनिया

 

आधुनिक युग में हर राष्ट्र की की अवधारणा अपने भौगोलिक वातावरण और देश की जनता की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता देती है। सामरिक सामर्थ्य पाना प्रत्येक “राष्ट्र” की पहली आवश्यकता बन चुकी है। शीतयुद्ध की समाप्ति और नई अर्थ केंद्रित विश्वव्यवस्था के आकार में आने के साथ ही पूरे विश्व से आपसी संघर्ष और शस्त्रों की होड़ कम नहीं होनी चाहिए थी? वैश्विक अर्थव्यवस्था, विश्व ग्राम और वैश्विक आरोग्य एवं कल्याण के अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से भरी मौजूदा विश्व व्यवस्था की वास्तविक प्राथमिकताएं आखिर हैं क्या? पूंजीवाद और साम्यवाद के ध्रुवों के समाप्त हो जाने के बाद भी आज पूरा विश्व राष्ट्रों के नए सुगठित और सुनियोजित बाजारवाद के चंगुल में फंसी हुई है? क्या बदलती  वैश्विक अर्थ व्यवस्था में समानांतर रूप से सैन्य व्यय कम होकर नागरिक कल्याण सर्वोपरि प्राथमिकताओं में नहीं आने चाहिए थे। कोरोना वायरस का लगातार बढ़ता प्रभाव आज पूरे विश्व को अपने गिरफ्त में ले लिया है।

इतना ही नहीं इस वैश्विक महामारी ने पूरी दुनिया की जरूरतों को कटघरे में खड़ा कर दिया है, कोरोना से तड़पती मानवता के भावी कल्याण का बेहतर विकल्प आज हथियारों की होड़ को प्रबंधित करने का भी हो सकता है। क्योंकि ताजा अनुभव यह भी बतात है कि कोई भी देश कितना भी तरतवार क्यों न हो लेकिन अपनी पूंजी या प्रौद्योगिकी के बल पर अकेले कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से नहीं जीत पायेगा। कोरोना महामारी से निबटने में नाकाम पूरे विश्व की स्थिति जनआरोग्य के मामले में सौ वर्ष पुरानी ही इबारत के पुनर्वाचन जैसी लगती है। आपको बता दे कि वर्ष 1918 में वैश्विक इन्फ्लुएंजा महामारी से लगभग 5 करोड़ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, और एक तिहाई आबादी बीमार रही। मौजूदा वक्त में विश्व की आबादी 4 गुना बढ़ चुकी है और एक संक्रमित व्यक्ति 36 घंटे में विश्व के किसी भी कोने में पहुंच सकता है। कोरोना वायरस का बढ़ता प्रकोप अगर काबू में नहीं आ सका तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि कोरोना से संक्रमित लोगों का आंकड़ा पांच करोड़ तक या उससे अधिक भी जा सकता है।

यानि 2020 की दुनिया उसी 1918 के दौर में खड़ी नजर आ रही है? हार्वर्ड ग्लोबल इंस्टिट्यूट के निदेशक डॉ. आशीष झा के मुताबिक कोरोना संक्रमण से अकेले भारत के अक्टूबर 2020 तक कोरोना से मरने वालों आंकड़ा 1 लाख 36 हजार 536 तक हो सकती है। प्रतिष्ठित जर्नल लासेन्ट ने अमेरिका के जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के शोध का जिक्र करते हुए कहा है कि लगभग पांच महीने बाद पूरे विश्व से लगभग 12 लाख बच्चे और 57 हजार मां कोरोना के प्रभावों के चलते मौत के मुंह में जा सकती हैं। इसी विश्वविद्यालय द्वारा जारी “ग्लोबल हैल्थ सिक्योरिटी रपट” में बताया गया है कि पूरे विश्व में कोविड-19 जैसी महामारी से निबटने का कोई प्रामाणिक सिस्टम अभी तक नहीं आया है। अमेरिका, स्पेन, रूस, इटली जैसे देशों में कोरोना के कहर से जुटी नागरिकों की लाशें इस विमर्श को भी खड़ा करतीं हैं कि क्या दुनिया को” वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा” को लेकर एक नई साझी और समावेशी नीति की ओर नहीं बढ़ना चाहिये? यह भी समझना होगा कि अमेरिका और रूस जहाँ कोरोना से सर्वाधिक मौतें हुई हैं वे दुनिया के सबसे बड़े हथियार निर्माता और निर्यातक मुल्क हैं।

जबकि हकीकत तो यह है की आज पूरे विश्व को हथियारों का बाजार लोकस्वास्थ्य से ज्यादा है क्योंकि यह अमेरिका, रूस, फ्रांस और यूरोप के एकाधिकार को बनाये हुए है। सवाल बुनियादी रूप से यही है कि विश्व में नागरिकों की सुरक्षा हथियारों के बल पर की जाना अधिक जरूरी है या महामारियों से? यानि कोरोना वायरस के संक्रमण से मानवता को बचाने के लिए वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडा स्थापित करने का वक्ता क्या अभी नहीं आया है। क्या जिन देशों ने हथियारों का जखीरा सजाया वे कोरोना से मुक्त हैं? नहीं बल्कि ये देश गरीब देशों के तुलना में अधिक संक्रमित हुए और इनके यहां लाशों के ढेर लग गए हैं। यानि उनके हथियारों का जखारी और सम्पन्नता इस माहामारी से लड़ने में कोई काम नहीं आ सकी। स्पष्ट है कि आर्थिक सम्पन्नता के बावजूद कोई भी देश आज या भविष्य में कोविड जैसे अन्य खतरनाक संक्रमणों से अकेले लड़ाई नहीं लड़ सकता है।जाहिर है दुनिया में वायरस अटैक की कोविड-19 जैसी संभावनाएं आने वाले वक्त में बलवती हैं।

ऐसे में मानव जाति की रक्षा ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियां कर पाएंगे या ग्लोबल स्वास्थ्य सेवाएं? तथ्य यह है कि आज वैश्विक प्राथमिकताओं को नए सिरे से निर्धारित किये जाने का सबसे सही वक्त चुका है। जितना कठिन मानवता को इन संक्रमित हमलों से बचाया जाना है शायद खतरनाक आयुध का विनिर्माण और निर्यात उतना चुनौतीपूर्ण नहीं है। राष्ट्रीय हित औऱ सामरिक सुरक्षा के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है तथापि कोविड-19 के त्रासदपूर्ण अनुभव के बाद वैश्विक प्राथमिकताओं में लोकस्वास्थ्य को सर्वोपरि रखने के लिए एक समावेशी पहल अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी जैसे धनी मानी मुल्कों को करनी ही होगी। यह भी तथ्य है कि ऐसा किया जाना व्यवहार में बहुत आसान भी नहीं है लेकिन इन्हीं सम्पन्न देशों का हैल्थ सिस्टम जिस तरह से कोविड के आगे लाचार नजर आया उससे आशा की जाना चाहिये कि दुनिया इस मौजूदा और आने वाले संकट की भयावहता को समझ कर मानवता के हक में आगे आने का संकल्प लेगी।

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