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02 September 2020

“सीने में आग जलाओ-बदला लो”- भारत ने तिब्बतियों को चीन से बदला लेने का सुनहरा मौका दिया है

 


चीनियों ने नर्क की जो भी कल्पनाएं की होंगी वह इस समय लद्दाख में उन्हें साकार होती दिख रही हैं। तिब्बत की दुर्गम पहाड़ियों उन्हें नर्क का अनुभव करा रही है भारतीय सेना की एक स्पेशल यूनिट, जिसका नाम है Establishment 22,आधिकारिक रूप से भारत की इस सैन्य टुकड़ी को SFF  भी कहते हैं।

मूल रूप से तिब्बती शरणार्थियों द्वारा बनाई गई इस सैन्य टुकड़ी का निर्माण चीन को ध्यान में रखकर ही किया गया था। विकास रेजिमेंट के नाम से विख्यात इस भारतीय विशेष सैन्य दस्ते में 10,000 सिपाही हैं, जो दलाई लामा के अनन्य भक्त हैं और 58 वर्षों से अपनी मातृभूमि को आजाद कराने का सपना देख रहे हैं। लद्दाख में चल रहे स्टैंडऑफ़ के कारण अब जाकर उन्हें यह सपना साकार करने का मौका मिला है।

हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार SFF  ने चीनियों के विरुद्ध समय पूर्व कार्रवाई करते हुए 29-30 अगस्त की रात दक्षिणी पैंगोंग झील के नजदीक, थाकुंग इलाके में Dominant Positions पर कब्जा कर भारत को सैन्य बढ़त दिला दी है।

इससे ना सिर्फ भारत ने अपनी सीमाओं को सुरक्षित कर लिया है बल्कि, अब वह पैंगोंग झील के दक्षिणी छोर पर पूर्णतः प्रभावी हो गया है। भारतीय सेना ने चीनी फौज को पीछे धकेलते हुए कई महत्वपूर्ण ठिकानों पर कब्जा कर लिया है।

द टेलीग्राफ के मुताबिक, “सोमवार सुबह तड़के पैंगोंग झील के आसपास की पहाड़ियों में एक विशेष अभियान द्वारा भारतीय सेना के विशेष सैन्य दस्ते ने एक चीनी शिविर पर कब्जा कर लिया।”

रिपोर्ट बताती है कि, विकास यूनिट की तैनाती ने पैंगोंग इलाके के सारे समीकरण पलट दिए हैं और भारत को बढ़त दिला दी है। SFF  के सैनिक पैराट्रूपर तो हैं ही साथ ही पहाड़ों पर गोरिल्ला वारफेयर में भी पारंगत है। एक पूर्व गोरखा रेजिमेंट कैप्टन ने कहा, “वे किसी भी हालत में जीवित रह सकते हैं।  सर्दियों की सुबह मैं उनमें से कुछ को अपने मुंह में बिल्कुल ठंडा पानी लेकर, उसे गर्म करते हुए, और फिर बाहर थूक कर उससे अपना चेहरा धुलते देखा है।” यह बताता है कि ये सैनिक कठोरतम हालातों में और भी कठोर हो जाते हैं।

उत्तराखंड के जगराता में SFF  का मुख्यालय है। SFF आत्मनिर्भर सैन्य दस्ता है अर्थात इसे अपने अभियान हेतु अन्य सैन्य दस्तों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती है। Director General of Security (DGS)  के अधीन आने वाला Establishment 22, भारतीय खुफिया एजेंसी R&AW से जुड़ा है। DGS की Aviation Research Centre की सहायता से SFF  चीनी सीमा के भीतर कोवर्ट ऑपरेशन करने में भी सक्षम है। यही कारण था कि, पैंगोंग झील के दक्षिणी छोर पर चीनियों के कैमरे और ट्रैकिंग सिस्टम होने के बाद भी SFF ने चीनी सेनाओं को अपनी कार्रवाई की भनक भी नहीं लगने दी।

साल 2016 में, भारत ने इस गुप्त कमांडो बल का पुनर्निर्माण शुरू किया था। चीन ने तब भारत को सावधान रहने और ऐसी कार्यवाही से बचने की सलाह दी थी। तब चीनी सरकार के एक विशेषज्ञ ने पूछा था कि क्या SFF  का पुनर्निर्माण सीमा समस्या का एक “व्यावहारिक” समाधान है? अब भारत ने PLA को यह समझा दिया कि न सिर्फ यह व्यवहारिक था, बल्कि चीनियों को सुधारने के लिए आवश्यक भी था।

अब यदि चीन पूर्वी लद्दाख में अप्रैल माह की यथास्थिति पुनः बहाल नहीं करता है, तो भारत 1950 के पूर्व की यथास्थिति को बहाल करने पर मजबूर हो जाएगा। एलएसी पर सभी तथ्यों को नकारने वाला चीन यह भूल रहा है कि एक तथ्य यह भी है कि, तिब्बत एक समय स्वतंत्र बौद्ध राष्ट्र था और जो भारतीय सेना बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में मुक्तिबाहिनी की मदद कर बांग्लादेश को आज़ाद करा सकती है, वह तिब्बत को भी चीनी कब्जे से मुक्त करवा सकती है।

SFF  तिब्बत मुक्ति संग्राम का मुख्य केंद्र है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस दस्ते का इतिहास यह बताता है कि, इसे बनाने में अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने भी प्रमुख भूमिका निभाई थी। तब चीन द्वारा विकसित किए जा रहे परमाणु जखीरे पर निगरानी के लिए SFF का इस्तेमाल किया गया था और और अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने इस दस्ते के फौजियों को paratrooping  की ट्रेनिंग दी थी। इस युद्धनीति का इस्तेमाल द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजी जर्मनी के खिलाफ किया गया था।

1979 तक अमेरिका भी तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध था। किंतु उसी समय अफगानिस्तान पर हुए सोवियत हमले के कारण अमेरिका का ध्यान इस ओर से हट गया। मगर आज सारे समीकरण बदल गए हैं। आज अमेरिका का पूरा ध्यान चीन की ओर ही है और तिब्बत मुद्दा उसकी चीन विरोधी नीति का मुख्य केंद्र है।

हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से बयान देते हुए स्टीफन बेगन ने कहा है कि, अमेरिका QUAD  देशों के साथ भी नाटो जैसा एक सैन्य संगठन बनाना चाहता है और इसमें भारत की केंद्रीय भूमिका होगी। इस बात की पूरी संभावना है कि, आने वाले समय में तिब्बत ही, अमेरिका और भारत के लिए, चीन के विरुद्ध संयुक्त रूप से लड़ने का मुख्य मुद्दा होगा।

SFF  की एल ए सी पर तैनाती सामरिक रूप से एक महत्वपूर्ण फैसला तो थी ही साथ ही इसके अन्य निहितार्थ भी हैं। अपने इस कदम के जरिए भारत सरकार ने चीन को यह संदेश दिया है कि, चीन ने अपने विस्तारवाद के तहत जितने लोगों पर जुल्म ढाए हैं, वही लोग अब चीन से लोहा लेने को तैयार हैं। सालों तक तिब्बतियों ने अपने घर से खदेड़े जाने की ज़िल्लत को सहा है। अब मोदी सरकार और भारतीय सेना ने उन्हें यह मौका दिया है कि वो चीन से अपनी सालों की ज़िल्लत का हिसाब चुकता करें।

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