चीन को किसी भी मोर्चे पर धूल चटा सकते हैं भारतीय स्पेशल फोर्स के कमांडो, ट्रेनिंग ऐसी की, कलेजा मुंह को आ जाए - Bollyycorn

Breaking

Bollyycorn

Bollywood-Hollywood-TV Serial-Bhojpuri-Cinema-Politics News, Gadgets News

16 September 2020

चीन को किसी भी मोर्चे पर धूल चटा सकते हैं भारतीय स्पेशल फोर्स के कमांडो, ट्रेनिंग ऐसी की, कलेजा मुंह को आ जाए

 

नई दिल्ली। देश में अधिकतर युवा भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा करना चाहते हैं। जिनमे से कई खुशकिस्मत अपने सपने को साकार करने में सफल भी साबित होते हैं। जिसके बाद उनमे से कुछ ही चुनिंदा लोग होते हैं जो एक खास ट्रेनिंग के बाद कमांडो बनाते हैं। भारतीय थलसेना में सबसे घातक पैरा कमांडो होते हैं। जो जब अपने किसी मिशन में पर जाते हैं तो दुश्मन को भनक तक नहीं लगती और उनकी लाशें जमीन पर पड़ी होती हैं। थलसेना की एलीट कमांडो फोर्स पैरा रेजीमेंट की स्थापना वर्ष 1941 में हुई थी। वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के बाद भारतीय सेना ने एक स्पेशल कमांडो यूनिट की कमी को महसूस किया। जिसके करीब एक वर्ष बाद 1966 में सेना ने स्पेशल फोर्स 9 पैरा यूनिट स्थापना की।

तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद एक पैरा कमांडो तैयार होता है। इस सख्त ट्रेनिंग का ही नतीजा होता है कि पैरा कमांडो अपने मिशन में काफी फेल नहीं होते हैं। कमांडो की ट्रेनिंग के दौरान उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता को परखा जाता है। जवानों की पीठ पर ट्रेनिंग के दौरान तीस किलों वजन का जरुरी सामान का लदा रहता है। जिसे लेकर ही उन्हें दिन में 30 से 40 किलोमीटर की रनिंग करनी होती है।

Special Story On Surgical Strike Para Commando - दुश्मन के लिए मौत का दूसरा नाम हैं सर्जिकल स्ट्राइक करने वाले पैरा कमांडो, इन हथियारों का करते हैं प्रयोग | Patrika News

कमांडो बनने के लिए कैडेट्स भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) और अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (ओटीए) से चुने जाते हैं। कमीशंड होने के बाद 5 वर्षों तक स्पेशल फोर्स के लिए वॉलिंटियर कर सकते हैं। प्रोबेशन पीरियड और पैराट्रूपर के बाद चयनित कैंडिडेट तब पैरा स्पेशल फोर्स के लिए अप्लाई कर सकते है। कड़ी ट्रेनिंग के बाद फिर एक वर्ष तक हॉस्टाइल जोन में काम करना पड़ता है। इस बाद ही कैंडिडेट को बलिदान बैज मिलता है।

पैरा (थलसेना) और मार्कोस कमांडो (नौसेना) पानी में मछली की तरह तैरते हैं। यकीन करना मुश्किल है लेकिन ट्रेनिंग के दौरान इनके हाथ और पैर बांधकर पानी में फेक दिया था, जिसमे इन्हे कुल 5 मिनट बिताने होते है। मार्कोज कमांडो का फिजिकल टेस्ट काफी ज्यादा ही मुश्किल होता है यही वजह है कि 80 प्रतिशत कैंडिडेट शुरू में ही छोड़ देते हैं।

Marcos Commandos Eliminating Terrorists In Jhelum Area - झेलम इलाके में आतंकियों का चुन-चुनकर सफाया कर रहे मार्कोस | Patrika News

गरुड़ कमांडो भारतीय वायुसेना की वो यूनिट से आपातकालीन और बचाव कार्यों में सबसे ज्यादा माहिर होती है। इनकी ट्रेनिंग काफी मुश्किल होती है और तीन वर्ष जो चलती है। ट्रेनिंग के दौरान कैंडिडेट को सेना, एनएसजी और पैरामिलिट्री फोर्सेस की सहायता से स्पेशल ऑपरेशन्स के विषय में पूरी जानकारी दी जाती है, जिसमे जंगल वॉरफेयर और स्नो सर्वाइकल भी शामिल हैं।

हाड़ फाड़ देने वाली ऐसी ट्रेनिंग के बाद तैयार होते हैं एयरफोर्स के गरुड़ कमांडोज़ - Know everything about Garud Commando Force: recruitment, training, tasks, role and connection with ...

आपको ये पोस्ट कैसी लगी नीचे कमेंट करके अवश्य बताइए। इस पोस्ट को शेयर करें और ऐसी ही जानकारी पड़ते रहने के लिए आप बॉलीकॉर्न.कॉम (bollyycorn.com) के सोशल मीडिया फेसबुकट्विटरइंस्टाग्राम पेज को फॉलो करें।

No comments:

Post a Comment