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13 September 2020

एक कार्टूनिस्ट का बेटा एक कार्टून से डर गया, शिवसैनिक अपनी ही विरासत की बखिया उधेड़ने में लगे हैं


मुंबई की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बसाने और बढ़ाने में मराठियों के साथ ही देश के अन्य भागों से आए लोगों का योगदान रहा है। मुंबई जिसे इंग्लैंड के राजा ने पुर्तगाल की राजकुमारी से शादी के बाद दहेज में प्राप्त किया था, जिस बंजर टापू को अंग्रेजों ने धन देकर खरीदा। जहाँ औरंगजेब के अत्याचारों से भागकर, सूरत से पहुँचे गुजराती, पारसियों ने अपने धंधे फैलाए। जहाँ बनी नावें इंग्लैंड की रॉयल नौसेना की शान होती थी, और आज जहाँ शिवसेना का कब्जा है, जो इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं कि मुम्बई सबकी है, इसे सबने मिलकर बसाया है।शिवसेना की सनक का शिकार फ़िल्मस्टारों से लेकर आम आदमी तक सब हैं। इसी सनक का शिकार नौसेना के पूर्व अधिकारी मदन शर्मा हुए हैं। शिवसेना मुंबई को मुगलिया सल्तनत के किसी सूबे की तरह चला रही है जिसमे बादशाह उद्धव ठाकरे की आलोचना की सजा उनकी शिव”सेना” के कार्यकर्ता देते हैं।हाल ही में उद्धव सरकार के इस मुगलिया कानून का शिकार एक नौसैनिक अधिकारी को तब होना पड़ा जब उन्होंने उद्धव ठाकरे पर बने एक कार्टून को व्हाट्सएप पर फॉरवर्ड कर दिया। नतीजा यह हुआ कि 8 से 10 शिवसैनिक उनके घर पहुंचे और उनके साथ मारपीट की।

गौरतलब है कि उद्धव ठाकरे संविधान और कानून के शासन की परिभाषा तो भूल ही गए हैं, साथ ही अपने पिता के संस्कारों को भी भूल चुके हैं। बाल ठाकरे खुद एक कार्टूनिस्ट थे, उनकी पूरी राजनीति, राजनीतिक घटनाक्रमों पर कार्टून बनाकर चली थी। उनकी ख्याति का कारण उनके द्वारा बनाए गए कार्टून ही हुआ करते थे।

बाला साहब ठाकरे के व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि वे एक राजनीतिज्ञ बाद में थे कार्टूनिस्ट पहले थे। कविता जैसे अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन का एक हिस्सा थी, कार्टून बाला साहब ठाकरे के जीवन का एक अभिन्न अंग था।

बालासाहेब ठाकरे की दूसरी विशेषता यह थी कि उन्होंने राष्ट्रवाद के मुद्दे पर प्रखरता से अपनी बात रखी। ऐसे में आज शिवसैनिकों ने एक कार्टून फॉरवर्ड करने पर जो व्यवहार पूर्व नौसेना अधिकारी के साथ किया है वह बाला साहब ठाकरे के सिद्धांतों को कुचलने जैसा है।

बाल ठाकरे की राजनीति के तरीके से बहुत से लोगों के के मतभेद हो सकते हैं। किंतु यह एक सर्व स्वीकृत बात है कि बाला साहब ठाकरे अपनी राजनीति में हमेशा स्पष्टवादी रहे। उनके सिद्धांतों को स्वीकार किया जाए या अस्वीकार किया जाए यह अलग मुद्दा है, किंतु यह सभी मानते हैं उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

बाला साहब ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाए जाने पर अपने एक वक्तव्य में कहा था कि “कांग्रेस में हिजड़े हैं इसलिए उन्होंने एक औरत को अपना नेता चुना है।” यह एक विवादास्पद टिप्पणी है या नहीं यह अलग विषय है लेकिन इतना तय है कि बाल ठाकरे किसी भी स्थिति में सोनिया का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सकते थे।

इतना ही नहीं जब तक उद्धव भाजपा के साथ थे, वह सोनिया गांधी को इटालियन आंटी कहकर बुलाते थे। कांग्रेस शिवसैनिकों को कानून का सम्मान करना भले नहीं सीखा पाई लेकिन उद्धव ठाकरे को “सोनिया गांधी का सम्मान कैसे करना है” यह सिखाने में कामयाब रही है।

वैसे तो राजनीति में सिद्धांतो की बलि चढ़ाना आम बात होती है लेकिन सिद्धांतों से जैसा अलगाव शिवसेना ने दिखाया है ऐसे उदाहरण विरले ही दिखते हैं। बालासाहब के सिद्धांत गलत हों या सही हों, वे उसपर सीधे चलना जानते थे। उनकी मृत्यु के बाद शिवसेना सिद्धांतो की सीधी सड़क पर 360 डिग्री घूमकर तेजी से दौड़ लगा रही ही।

शिवसेना को इतिहास और कानून के शासन की परिभाषा की जानकारी पहले ही नहीं थी, अब उसने बाल ठाकरे के सिद्धांतों और उनकी प्रिय “कार्टून बनाने की कला” की पोटली बनाकर अरब सागर में फेंक दी है।

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