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05 September 2020

नीतीश कुमार जीतन मांझी के लिए कर रहे पासवान को किनारे, कहीं चुनावों में दांव उल्टा न पड़ जाए


महागठबंधन से निकलने के बाद HAM प्रमुख जीतनराम मांझी ने एनडीए का दामन थाम लिया है। जेडीयू के साथ गठबंधन करने का ऐलान करते हुए मांझी ने कहा कि हम बिना शर्त जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के साथ गठबंधन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि, “हम जेडीयू के साथ मिलजुल कर चुनाव लड़ेंगे।’’अब नीतीश कुमार और मांझी की खूब जुगलबंदी देखने को मिल रही है, वहीं LJP से नीतीश कुमार चिढ़े हुए हैं। अगर BJP ने जल्द से जल्द आवश्यक कदम नहीं उठाए तो चुनावों से पहले ही NDA में पनपी दूरी एक खाईं बन जाएगी, जिसका खामियाजा चुनावों के दौरान भुगतना पड़ेगा।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि चिराग पासवान के बढ़ते कद को देखते हुए नीतीश कुमार ने उनके खिलाफ दलित फॉर दलित की नीति से काम करना शुरू कर दिया था। नीतीश कुमार को चिराग पासवान से डर है कि कहीं वे उनकी कुर्सी न हड़प लें। जब से चिराग पासवान ने बयान दिया है कि वे भी एक दिन मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं तब से JDU में एक भूचाल आया हुआ है। यही कारण हैं कि नीतीश कुमार अब HAM को NDA में शामिल कर LJP के खिलाफ दलित कार्ड खेलने की तैयारी कर रहे हैं।

HAM के कारण NDA में कलह खुलकर सामने आ गयी। नीतीश किसी भी तरह से LJP को नीचा दिखा कर जीतनराम मांझी को अधिक महत्व दे रहे हैं, वहीं बीजेपी के सुशील मोदी भी LJP को दरकिनार करने की कोशिशों में जुट गए हैं।

एक समय नीतीश की JDU से बगावत कर HAM बनाने वाले जीतनराम मांझी फिर से JDU का समर्थन किया है और कहा, ‘जहां लोजपा के उम्मीदवार होंगे, वहां हमारी पार्टी भी प्रत्याशी उतारेगी।’’ वहीं हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रवक्ता दानिश रिजवान ने कुछ ही दिनों पहले LJP के खिलाफ अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा था कि, “हमारा एजेंडा साफ है कि हम नीतीश कुमार के हाथों को मजबूत करने आएं हैं, हम सीट शेयरिंग में कोई हिस्सेदारी नहीं मांग रहे हैं। अगर नीतीश कुमार के खिलाफ चिराग पासवान भी जुबान खोलेंगे, तो हमें भी जुबान खोलना पड़ेगा। अगर चिराग पासवान यह धमकी दे रहे हैं कि जेडीयू के उम्मीदवारों के खिलाफ वो अपने उम्मीदवार खड़ा करेंगे, तो उनकी सीटों पर हम भी आपने कैंडिडेट्स खड़ा करेंगे।’’

NDA के अंदर ही दो दलित पार्टियों का एक-दूसरे के खिलाफ उतरना कहीं से भी BJP के लिए शुभ संकेत नहीं है। नीतीश कुमार चाहते हैं कि उनका वर्चस्व बना रहे और इसीलिए उन्होंने अब LJP के दलित वोटों के काट के लिए HAM को मैदान में उतार दिया है। परंतु BJP को LJP का खुल कर समर्थन करना चाहिए।

अगर विधानसभा चुनावों की बात करे तो अभी तक दोनों ही पार्टियों को कोई अधिक सीटें नहीं मिली हैं। 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में, LJP NDA के साथ विधानसभा की 243 में से 40 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें इसने केवल दो सीटें जीतीं थी। वहीं उसी विधान सभा चुनावों में HAM NDA में शामिल हुई थी और 21 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। उस दौरान नई नवेली HAM को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली थी। परंतु 2019 के आम चुनावों में LJP ने 7 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें उन्हें 6 पर जीत मिली थी। चिराग पासवान के रूप में इस पार्टी के पास एक युवा नेतृत्वकर्ता है जो इस पार्टी के पुनरुत्थान में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है। बिहार के युवा चिराग पासवान को पसंद भी करते हैं। इस कारण से वे युवाओं के वोट को भी आकर्षित कर सकेंगे। LJP और HAM भले ही राज्य की सबसे बड़ी पार्टियां न हो परन्तु इन दोनों में से यदि कोई बेहतर प्रदर्शन करता है तो वो LJP ही है।

पासवान का वोट बैंक HAM की तुलना में मजबूत और व्यापक है। चिराग पासवान जिस तरह से बिहार की जनता की समस्याओं के लिए जनता की आवाज बने हैं उससे भी राज्य में LJP का महत्व बढ़ा है और आगामी विधानसभा चुनाव में ये पार्टी पहले की तुलना में और बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। यही नहीं, HAM खुद बगावत झेल रहा है। ऐसे में इसका प्रभाव पहले की तुलना में और भी कम होगा। HAM के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष उपेंद्र प्रसाद ने बगावत के स्वर तेज करते हुए कहा कि वे महागठबंधन में ही रहेंगे, एनडीए में नहीं जाएंगे। ZEE news की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि, “मैं एनडीए में जाने के जीतनराम मांझी के फैसले के साथ नहीं हूँ। हमारे साथ हम पार्टी की प्रदेश की आधी कमेटी भी महागठबंधन में ही रहेगी।’’

जिस तरह से कोरोना वायरस की महामारी के दौरान बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुली है वैसे ही बिहार की जनता कुशासन से त्रस्त है। फिर भी बीजेपी नीतीश कुमार के साथ ही चुनाव में उतरने की बात कर रही और नीतीश अब भी LJP को कम आंक रहें  है जो एनडीए के लिए शुभ संकेत तो बिलकुल नहीं है।

बिहार बीजेपी को चाहिए कि वो पूरे आत्मविश्वास के साथ आगामी चुनाव में उतरे और चिराग पासवान के महत्व को समझे अन्यथा नीतीश कुमार की हाँ में हाँ मिलाने के चक्कर में चुनावों में मायूसी भी हाथ लग सकती है।

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