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05 September 2020

जिन पावन चरणों में है पूरा जहान, वही गुरु है महान

अरविंद कांत त्रिपाठी

“जो उदार है, उच्च है, सरल है और शिष्ट है। जो अनुपम है, निरुपम है, अतुल, अनमोल है। जो धीरज है, धर्म है, धारा और ध्यान है। जो उपकारी है, उपासना है, ऊर्जा है, उल्लास है। जो प्रकाश है, प्रकाशक है, प्रबुद्ध है, प्रवाह और प्रकर्ष है। जो प्रतिपाल है, प्रतिबोध है और प्रतिमान है- ऐसे अनुपम, अद्वितीय और अप्रतिम गुणों का अधिष्ठान ही भारतीय जीवन संस्कृति में “गुरु” के परमपूज्य पद पर प्रतिष्ठित है। जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है, ‘मोक्ष’। जगत का कण-कण मायावी है। माया की सृष्टि है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, माया, मत्सर, राग, द्वेष, अभिनिवेश (मृत्यु का भय) आदि माया रचित कठोर चक्रव्यूह हैं। इनको सफलतापूर्वक भेदते हुए, जीवन के परमलक्ष्य (मोक्ष) की प्राप्ति का उचित मार्ग बताने वाला अतिविशिष्ट और विराट व्यक्तित्व ही, गुरु है। भारतीय जीवन दर्शन की परमादरणीय संज्ञा है, वह।

“गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट”…
सभ्यता के प्रथम चरण से ही अनाकार, अनगढ़ और अबोध बाल-मन को गढ़कर सफल मानव व्यक्तित्व देने वाली साधना का नाम है, “गुरु”। गोविंद (ईश्वर) के ‘भी’ अस्तित्व व कृतित्व का प्रथम ज्ञान-ज्ञान होने के कारण वह गोविंद से भी श्रेष्ठ है –
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय” – कबीर के इस यथार्थ अहलाद को युगों का समर्थन है। भारतीय संस्कृति में गुरु अपने शिष्य को अनेक विषयों व विधाओं में शिक्षित और दीक्षित करता है। बाद में वही शिष्य, गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान से अपने शिष्यों को गढ़ता है। ज्ञान के आदान-प्रदान का यही अनवरत क्रम भारतीय जीवन-पद्धति में ओजस्वी ‘गुरु-शिष्य’ परम्परा के रूप में प्रतिष्ठित है। मशीन आधारित पाश्चात्य जगत की औद्यौगिक-क्रांति से विश्व की सेहत प्रभावित होने लगी थी। साम्राज्यवादी प्रसार और उसके प्रभाव में औपनिवेशिक (गुलाम) देशों के जीवन-मूल्य करवट बदलने लगे। अंग्रेजी शासन में भारतभूमि पर विकसित अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजीयत से गुरु-शिष्य परम्परा विद्रुपित होने लगी। आदिकाल से अपार श्रद्धा, आदर, अपनत्व और परोपकार जैसे गुणों से ओतप्रोत यह निर्बाध-धारा अंग्रेजी काल से ही अवरुद्ध हो-होकर आचरण और व्यवहार में हिचकोले खाने लगी।

भारतीय धरा पर “गुरु” उपाधि है, शब्द नहीं, अत: यहां गुरु का कोई पर्यायवाची नहीं था। किन्तु अंग्रेजी शिक्षा और शब्दकोष के पन्नों से मास्टर, रीडर, प्रोफेसर, लेक्चरर आदि शब्द गुरु के पर्यायवाची बन गए। अब एकनिष्ठ-एकरस-एकरूप गुरु अनेक शक्ल और रस-रूप वाला हो गया। यह गुरु के असीम-गुरुत्व (अथाह वजन) का विभाजन था। अत: मर्यादा और निष्ठा भी विभाजित हुई। इस रूपांतरण से आचरण की मर्यादा और चरित्र की सम्पदा में भी रूपांतरण हुआ और उपयोगीतावा (लाभ-हानि) के हवाले होकर गुरु-शिष्य परम्परा- ‘शिक्षक-छात्र’ व्यवस्था में तब्दील हो गई।

गुरु-शिष्य परम्परा का प्रमुख आधार था ‘ज्ञान’। जबकि शिक्षक-छात्र व्यव्स्था में ‘शिक्षा’ प्रमुख हो गई। आदमी को इंसान बनाना, ज्ञान का लक्ष्य है। शिक्षा का लक्ष्य- आदमी को इंजीनियर, डाक्टर, कलेक्टर बनाना है। नैतिक मूल्यों के उत्थान और व्यवहार के बिना, ज्ञान का कोई मोल नहीं। जबकि जज, कलेक्टर, इंजीनियर, डाक्टर, तहसीलदार, लेखपाल, पटवारी, कानूनगो आदि बनने के अलावा शिक्षा का कोई मतलब नहीं। युग गुजरा तो गुरु-शिष्य परम्परा भी संग्रहालयों में रखी दुर्लभ संज्ञा के समान हो गई। गुरुकुल और आश्रमों के बाद पाठशालाओं के युग से होती हुई शिक्षा व्यवस्था उन कान्वेंट स्कूलों तक आ पहुंची है, जहां गुरु के स्थान पर ‘सर या मैडम’ तथा शिष्य की जगह ‘स्टूडेंट’ (छात्र) हैं।

मध्यकाल तक जो गुरुश्रेष्ठ अपनी विधा में सम्पूर्ण जगत था, स्वयं की साधना से निर्मित स्वयं-संघ था वही, आधुनिकता के खांचे में अपनी ‘संपूर्णता’ को खोकर, शिक्षकों के संघ का ‘एक अंक’ मात्र हो गया है। वह शिक्षक है, ग्रामप्रधान और गणक (जनगणना करने वाला) भी। गणित, भौतिक-विज्ञान और रसायन-विज्ञान आदि विषयों के विशेषज्ञ नाम से वह खम्भों पर लटका इस्तहार है। वह महंगे ‘कोचिंग-संस्थानों’ का “सर” है। किन्तु उसकी निष्ठा कोचिंग में पढ़ने वाले छात्रों के प्रति भी नहीं। जहां ‘पैकेज’ (सालाना वेतन) ज्यादा तय हुआ, वहां चल दिए। ईश्वरीय कृपा से गरीब बच्चों के भी चंद शिक्षक हैं, मूल्यों संग जीने वाले दुर्लभ प्रजाति के गुरु। बहुत से शिक्षकों की, शिक्षक के अलावा और भी बहुत सी अन्य पहचान है। गुरु आभा की यह सुगति है, प्रगति है, उन्नति है या अवनति? पता नहीं। वह एकांत में हैं तो वह अकेले हैं, अज्ञात हैं। शिक्षक संघों में उनका संघनित अस्तित्व है। संघरूप उनका अस्तित्व छात्रों से उनके अलगाव (दूरी) का पर्याय है। क्योंकि अपने हित के लिए शिक्षकों की तरह छात्रों का भी अपना ‘संघ’ है। दोनों (शिक्षकों और छात्रों ) का अपना-अपना स्वतंत्र खेमा है, आचारण और व्यवहार है। “शिक्षक दिवस”- इन्हीं दो खेमों के मध्य की चौड़ी खाई में, साल में एक दिन बैठकर मना ली जाने वाली औपचारिकता है।

जिस गुरु का मान, सम्मान, हित और आनंद, शिष्य के उत्थान और उत्कर्ष में था और शिष्य का यही सब कुछ गुरु चरणों के समर्पण में था वह स्थानांतरित होकर कहीं और हो गया है। सम्भवत: बाजारवाद में। ‘हितों’ का यह विचलन ‘ही’ दो युगों के मध्य की विभाजन रेखा है। गुरु-शिष्य परम्परा के लगभग निष्प्राण हो जाने या गुजर जाने का प्रमाण है। शिष्य एक थे, एक ही उनकी पहचान थी। किन्तु शिक्षकों की भांति वह भी, अनेक वर्ग, जाति और पंथ में बंट गए। यही आधुनिकता है। हृदय में सदैव अनुरंजित होने वाली औपनिषदिक कामना- “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय”- का स्थान टकराव और चुनौती देने वाले नारों— “अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है”, जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा”… ने ले लिया।

संघों का गठन, समय की मांग हो सकती है किन्तु संघों से, शिक्षकों और छात्रों का आदर, सम्मान और हित कितना सुरक्षित है? पता नहीं। लेकिन देश व प्रदेश की राजधानियों में अपनी मांगों को लेकर उनके प्रदर्शन पर, पुलिसिया-लट्ठकला से हाथ, नाक, घुटना और मुंह फूटने का दृश्य, कुछ बताता जरूर है। “उपयोगितावाद” के झंझावात में ‘भी’ गुरु-शिष्य के बीच परस्पर श्रद्धा और समर्पणभाव को जीवन्त रखने के लिए भारत में वर्ष 1962 से ज्ञान-गगन के अनमोल प्रकाश-पुंज डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन (5 सितम्बर) को प्रति वर्ष शिक्षक दिवस के रूप में मानने का श्रीगणेश हुआ। 80 के दशक तक स्कूलों और विद्यालयों में पूरे उत्साह से मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस कान्वेंट स्कूलों के कल्चर से परिचित हुआ। फिर सोशल-मीडिया के मंच पर पहुंचकर आज एक दिन के लिए शिक्षित-समाज द्वारा निर्वाह की जाने वाली आवश्यक औपचारिकता बन चुकी है।

प्राचीनकाल से लेकर आज तक भारत में जो कुछ भी है, वह गुरु अर्थात शिक्षक की शिक्षा का ही परिणाम है। संकट सिर्फ गुरु के प्रति अपरिमित श्रद्धा के भाव, के ‘अभाव’ का है। भारत भूमि पर यह आदिकालीन अभाव नहीं बल्कि समकालीन भटकाव है। यह भटकाव ‘भी’ वाह्य नहीं आन्तरिक है। अपने अंदर का भटकाव है। अपने अंतश में लौटकर ही गुरुश्रेष्ठ की दैवीय-आभा का ज्ञान, दर्शन और बोध सम्भव है। किन्तु माया की अंधी दौड़ में गिरते-पड़ते भागते आदमी की घर वापसी कराने का यह कार्य भी तो गुरु का ही है। ध्यान रहे, सनातन मान्यता में डिग्रीधारी कोई व्यक्ति विशेष ही शिक्षक या गुरु नहीं बल्कि जीवन में उत्थान और उत्कर्ष का ज्ञान देने वाला पथ प्रदर्शक हर व्यक्ति गुरु है, शिक्षक है। मां, पुत्र की प्रथम गुरु है। पिता विशिष्ट गुरु है। समाज शिक्षक है। किन्तु सबके मूल में वही गुरु है।

एक सलोनी याद,

नन्हें से हाथों पर तड़कती, मास्टर जी की छड़ी,
…वह मेरा पहला स्कूल था।

वस्तुत: –
“गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर:
गुरु: साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:।।”

(लेखक मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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