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27 September 2020

“बाप का नहीं हुआ वो हमारा क्या होगा” आज अखिलेश और तेजस्वी एक ही नांव पर सवार हैं


बिहार क विधानसभा चुनाव से पहले कुछ ऐसी परिस्थियाँ बन रही हैं जो वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की याद दिला रही हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में भी ‘यादव’ परिवार वैसे ही चर्चा में है जैसे यूपी के विधानसभा चुनाव में ‘यादव’ परिवार था। यूपी में अखिलेश यादव ने अपने पिता को साइडलाइन कर दिया तो बिहार में तेजस्वी यादव ने अपने पिता लालू यादव को कर दिया है। ये हम नहीं कह रहे बल्कि ‘महागठबंधन’ की कांग्रेस पार्टी कह रही है। अब इसे इत्तेफाक ही कहिये कि यहां भी कांग्रेस पार्टी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है कैसे ? चलिए इसे विस्तार से समझते हैं।

बिहार के चुनाव होने में अब बस एक महीना शेष है, और इसी के साथ चुनावी प्रचार भी जल्द ही आरंभ होगा,परन्तु बिहार के चुनाव में हिस्सा ले रही पार्टियों की स्थिति पिछली बार की तुलना में काफी भिन्न दिखाई दे रही हैं, खासकर राजद की। जहां एनडीए गठबंधन अपनी तैयारियों को लेकर काफी आश्वस्त है, तो वहीं ‘महागठबंधन’ टूटने के कगार पर है। स्थिति यह है कि आरजेडी का सबसे विश्वसनीय सहयोगी पार्टी कांग्रेस भी उसके साथ गठबंधन में नहीं बना रहना चाहताी है।

परंतु ऐसा क्या हो गया, जो अब कांग्रेस तक चुनाव से पहले आरजेडी से नाता तोड़ना चाहती है? इसका एक ही कारण है – तेजस्वी यादव, जो इस समय राष्ट्रीय जनता दल के अनाधिकारिक अध्यक्ष है, इस समय पार्टी में केवल इन्हीं का वर्चस्व है। चूंकि लालू यादव जेल में है, इसलिए पार्टी की कमान इस समय तेजस्वी यादव के हाथों में है, और वर्तमान घटनाओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि तेजस्वी यादव और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव में कोई विशेष अंतर नहीं है।

ऐसा कैसे हो सकता है? यदि आप आरजेडी के चुनावी प्रचार प्रसार पर ध्यान दें, तो आप पाएंगे कि हर जगह केवल तेजस्वी यादव का बोलबाला है, और आरजेडी को अस्तित्व में लाने वाले लालू यादव पोस्टर्स पर न के बराबर दिखाई दे रहे हैं। RJD के पोस्टर पर अब सिर्फ और सिर्फ तेजस्वी यादव ही दिखाई दे रहे हैं। तेजस्वी यादव द्वारा पोस्टर में लालू यादव का चेहरा न इस्तेमाल किये जाने के कारण कांग्रेस तेजस्वी यादव का विरोध कर रही है। जनसत्ता की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह बिहार में लालू के भरोसे ही चुनाव लड़ने जा रही है। कांग्रेस प्रवक्‍ता गौरव बल्‍लभ ने आज तक टीवी चैनल पर कहा कि लालू यादव आज हर बिहारी की पहचान हैं और उनके आशीर्वाद से महागठबंधन चुनाव में काफी अच्‍छा प्रदर्शन करेगी।

इसी हेकड़ी का परिणाम है कि जीतन राम मांझी जैसे नेता महागठबंधन से नाता तोड़कर पुनः एनडीए में शामिल हो गए हैं, तो वहीं रालोसपा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भी महागठबंधन छोड़ने के संकेत दिये हैं। तेजस्वी की हेकड़ी और अकड़ के कारण आरजेडी के अंदर भी विद्रोही लहर उमड़ रही है, और इसी कारण से कभी RJD का आधार स्तम्भ माने जाने रघुवंश प्रसाद सिंह को मृत्यु से पहले पार्टी छोड़ने पर विवश होना पड़ा था।

बिहार में चल रही ये राजनीतिक घटनाएं उत्तर प्रदेश की विधानसभा चुनाव से पहले के घटनाक्रम जैसे ही हैं. ऐसा ही कुछ वर्ष 2017 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिला था जब समाजवादी पार्टी सत्ता में थी, और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। जैसे चुनाव से कुछ माह पूर्व आरजेडी सत्ताधारी एनडीए, विशेषकर जेडीयू को चुनौती देने योग्य दिख रहा था, वैसे ही चरमराती कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के बावजूद अखिलेश यादव की स्थिति बेहद मजबूत थी, और चुनावी विशेषज्ञों का मानना था कि वे सत्ता में दोबारा वापसी कर सकते हैं।

लेकिन वो कहते हैं न, लालच बुरी बला है। 2016 आते आते अखिलेश यादव के मन में सत्ता और पार्टी, दोनों पर ही अपना वर्चस्व जमाने का ख्याल आया। उन्हें इस दिशा में बढ़ावा उन्हीं के रिश्तेदार राम गोपाल यादव ने, और सत्ता के नशे में चूर अखिलेश यादव पार्टी के आदर्शों की ही अनदेखी करने लगे। यही नहीं, सत्ता वापसी के पूरे आसार होने के बाद भी अखिलेश ने कांग्रेस पार्टी से गठबंधन करने का निर्णय किया, और ये स्पष्ट हो गया कि पार्टी में अब पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव की भी नहीं चलती है।

हालांकि, यह बात मुलायम के छोटे भाई और पार्टी के कद्दावर नेता शिवपाल सिंह यादव को नागवार गुज़री, जिन्होंने अखिलेश की हेकड़ी का विरोध किया।

पार्टी में अंतर्कलह हो गई, और अपने ही पिता को ठेंगा दिखाते हुए अखिलेश यादव ने शिवपाल को पार्टी से बाहर होने पर विवश कर दिया, ठीक वैसे ही, जैसे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव की हेकड़ी के कारण रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को पार्टी छोड़नी पड़ी थी।

अखिलेश ने सोचा कि औरंगज़ेब की तरह उत्तर प्रदेश के राज्य पर उनका एकछत्र शासन होगा, लेकिन अकड़ में चक्रवर्ती सम्राट एवं लंकाधिपति रावण भी टिक नहीं पाये, तो भला अखिलेश यादव की क्या हस्ती? 2017 में अखिलेश यादव ने दावा किया था कि कांग्रेस सपा गठबंधन के जरिये 1993 के बसपा-सपा गठबंधन के ‘जादू’ को दोहराएगी, परंतु सत्ता में वापसी तो दूर, समाजवादी पार्टी और काँग्रेस कुल 100 सीट भी अर्जित नहीं कर पाये।  ऐसे में जिस प्रकार से तेजस्वी यादव आरजेडी पर एकछत्र शासन चाहते हैं, वो कई मायनों में अखिलेश यादव के घमंडी स्वभाव की याद दिलाता है, और जिस प्रकार से घटनाएँ घट रही है्ं, उससे अंत में तेजस्वी का हाल ऐसा होगा, कि वे न घर के रहेंगे और न ही घाट के।

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