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21 August 2020

जगजीवन राम से लेकर जीतन राम तक, बिहार की दलित राजनीति की विडंबनाएं

जगजीवन राम से लेकर जीतन राम तक, बिहार की दलित राजनीति की विडंबनाएं

इन दिनों न चाहते हुए भी बिहार में चुनावी राजनीति का मौसम अपने नजारे दिखाने लगा है. चुनावों के मद्देनजर जहां एक तरफ सरकार अफसरों के तबादले करने में जुटी है, तो दूसरी तरफ नेता अपनी सुविधा के दलों में जाने की होड़ में हैं. पुराने गठबंधन टूटते और नए गठबंधन आकार लेते नजर आ रहे हैं. चिराग पासवान बार-बार लोजपा के अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दे रहे हैं तो जीतनराम मांझी अपनी पार्टी का विलय सत्ताधारी दल जदयू में करने के लिए प्रयासरत दिख रहे हैं. इस तरह दोनों धड़ों में दलितों की राजनीति के इधर से उधर शिफ्ट होने के संकेत हैं. इस बीच एक अन्य दलित समुदाय के बड़े नेता श्याम रजक पहले ही पाला बदल चुके हैं. उन्हें जदयू को छोड़ कर राजद में अपनी जगह तलाश ली है.

ऐन चुनाव के पहले राज्य के दलित नेताओं के इधर से उधर शिफ्ट होने से कई बार ऐसा आभास होता है कि कहीं इस चुनाव में दलित राजनीति एक महत्वपूर्ण सवाल तो नहीं बनने जा रहा. यह सवाल इसलिए भी मन में आता है, क्योंकि सामाजिक न्याय की राजनीति की प्रयोगशाला बनने के बावजूद बिहार में दलितों के असल सवाल कभी राजनीति के केंद्र में नहीं आए. यहां जरूर जगजीवन राम से लेकर जीतन राम तक कई बड़े दलित राजनेता हुए, मगर यह दलितों की राजनीति का उस तरह केंद्र नहीं बन पाया, जिस तरह पिछड़ों की राजनीति यहां केंद्रीय भूमिका में रही. जिस तरह उत्तर प्रदेश में कांशीराम और मायावती जैसे कद्दावर दलित राजनेता का उभार हुआ, जिसने एक दशक से अधिक वक्त तक वहां की राजनीति को दलितों के सवालों के इर्द-गिर्द घूमने के लिए विवश किया. जिस तरह महाराष्ट्र की राजनीति को दलित-पैंथर राजनीतिक संगठनों ने प्रभावित किया.

जबकि आजादी के बाद 80 और 90 के दशक में दलितों के साथ सामूहिक जनसंहार की कई घटनाएं सामने आईं. मगर इनमें से किसी नेता ने कभी इन सवालों को अपनी राजनीति का केंद्रीय विषय नहीं बनाया. दलितों के साथ उत्पीड़न की घटनाएं आज भी बिहार में होती हैं, इनमें न सिर्फ सवर्णों की भूमिका होती है, दबंग पिछड़ी जातियां भी अक्सर दलितों पर हमलावर होती हैं. मगर ये अन्याय कभी राजनीतिक बहस के केंद्र में नहीं आते.
सिर्फ उत्पीड़न का मसला ही नहीं है. बिहार के दलित सामाजिक-आर्थिक रूप से आज भी उतने ही पिछड़े हैं, जितने आजादी के वक्त थे. वे भूमिहीन हैं, गरीब हैं, उनके बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं, शिक्षा की रोशनी आज भी उनमें से ज्यादातर घरों तक नहीं पहुंच पाई है. बाढ़ हो, सुखाड़ हो, चमकी बुखार हो, किसी भी आपदा के सबसे आसान शिकार वही होते हैं. मगर इस समाज के बड़े नेताओं में अपने समाज का स्तर उपर उठाने का जुनून आम तौर पर नहीं दिखता. यह बिहार की राजनीति का आश्चर्यजनक किस्म का विरोधाभास है.

दिलचस्प है कि बिहार में दलित राजनीति की शुरुआत 30 के दशक में ही हो गई थी. तब जगजीवन राम जैसे राजनेता में कांग्रेस पार्टी को भविष्य नजर आया था. उन्हें आंबेडकर के विकल्प के रूप में खड़ा करने की कोशिश की गई थी. जगजीवन राम युवावस्था में ही राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन गए. उन्होंने ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास लीग की स्थापना की. उनके असर में जरूर बिहार के कुछ दलित नेता सामने आए, मगर उनके द्वारा उठाए गए बिहार के दलितों के सवाल एकेडमिक मसले बन कर रह गए.

आजादी के ठीक बाद बिहार ने किराय मुशहर जैसे अंत्यज समाज के नेता को सांसद बनाकर दिल्ली भेजा. मगर किराय मुशहर के पीछे की ताकत समाजवादी नेता भूपेंद्र नारायण मंडल थे. वे दलित राजनीति के प्रतीक जरूर थे, मगर वे दलितों के संघर्ष का प्रतीक नहीं बन पाए. फिर कांग्रेस ने भोला पासवान शास्त्री जैसे दलित नेता को आगे बढ़ाया. भोला बाबू सादगी के प्रतीक थे. तीन दफा मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहने के बाद भी जब उनकी मौत हुई तो उनका बैंक खाता खाली था. उसमें दाह संस्कार करने लायक पैसे भी नहीं थे. मगर उनकी सादगी भी दलितों के उत्थान के काम नहीं आई. वे खुद इंदिरा गांधी जैसी कद्दावर नेता के अधीनस्थ थे, उन्हीं के रहमोकरम पर सीएम बनते थे. कभी छह महीने के लिए तो कभी तीन महीने के लिए, कभी तेरह दिन के लिए भी.

हां, वे जरूर आठ बार लोकसभा में पहुंचे और 1989 से लेकर आज तक लगभग पूरे 30-31 साल की अवधि में ज्यादातर वक्त केंद्र में मंत्री रहे हैं. उनका पूरा परिवार आज राजनीति में स्थापित है. अब वे अपने पुत्र को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने के लिए प्रयासरत हैं. इस तरह से वे बिहार के ही नहीं पूरे देश के सबसे सफल दलित राजनेता हैं.

उनके बाद 2014 में एक और दलित राजनेता बिहार की राजनीति में उभरते हैं, वे जीतनराम मांझी हैं. जिन्हें नीतीश कुमार अपनी जगह बिहार का मुख्यमंत्री बनाते हैं. बाद में वे उन्हीं से बगावत करके अपना अलग राजनीतिक दल हम पार्टी का गठन करते हैं. वे बिहार के उस मुशहर जाति के सबसे बड़े नेता हैं, जो आज भी देश की सबसे अंत्यज जाति है. भुखमरी और कुपोषण का जब भी नाम आता है तो सबसे पहले मुशहरों का ही नाम सामने आता है. मगर पिछले पांच-छह साल की इस नेम-फेम वाली सक्रियता में भी उन्होंने कभी दलितों क्या मुशहरों के लिए भी कोई संघर्ष किया हो, कोई काम किया हो, अपने समाज से जुड़ने की कोशिश की हो, ऐसे उदाहरण कम हैं.

ये उदाहरण बिहार की दलित राजनीति की विडंबना की कहानी कहते हैं. इन उदाहरणों से ऐसी धारणा बन जाना बहुत स्वाभाविक है कि बिहार के दलित नेता, प्रतीकात्मक राजनीति का सहारा लेकर अपना व्यक्तिगत करियर तो संवारते रहे हैं, मगर उनके बड़े होने से दलितों के सवाल बड़े नहीं हुए. वे बौने ही रह गए. क्या इस बार भी चुनाव में दलितों के सवाल मुखर होंगे या ये नेता इस बार भी वोटों के गणित में अपने करियर का अंकगणित सुधारते रहेंगे.

(वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)

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