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25 August 2020

पितरों का तर्पण – अगर पुत्र न हो तो कौन कर सकता है श्राद्ध?

पिता का श्राद्ध करने का अधिकार मुख्य रूप से पुत्र को ही है। यदि पुत्र न हो, तो शास्त्रों में श्राद्ध के अधिकारी के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं प्राप्त हैं। शास्त्रों में इस बात की विस्तृत व्याख्या है कि परिवार के कौन-कौन से सदस्य श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। कई ऐसे पितर होते हैं, जिन्हें पुत्र संतान नहीं होती है या फिर जो संतानहीन होते हैं। ऐसे पितरों के प्रति आदरपूर्वक अगर उनके भाई, भतीजे, भांजे या चाचा-ताउ के परिवार के पुरुष सदस्य पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर पिंडदान, अन्नदान और वस्त्रदान करके ब्राह्मणों से विधिपूर्वक श्राद्ध कराते हैं, तो पितर संतृप्त होते हैं और उनको मुक्ति मिलती है।

स्मृति संग्रह तथा श्राद्ध कल्पलता के अनुसार, श्राद्ध अधिकारी पुत्र, पौत्र, धेवता (पुत्री का पुत्र), पत्नी, भाई, भतीजा, पिता, माता, पुत्रवधू, बहन, भांजा, सपिंड तथा सोदक कहे गए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भतीजा अथवा अपनी सपिंड संतति में (स्वयं से लेकर पूर्व की सात पीढ़ी तक का परिवार सपिंड कहलाता है) उत्पन्न हुआ पुरुष ही श्राद्ध आदि क्रिया करने का अधिकारी होता है। यदि इन सबका अभाव हो, तो समानोदक (आठवीं से लेकर चौदहवीं पीढ़ी तक के पूर्वज परिवार) की संतति अथवा मातृपक्ष के सपिंड (स्वयं से लेकर पूर्व की सात पीढ़ी तक का परिवार) अथवा समानोदक (आठवीं से लेकर चौदहवीं पीढ़ी तक के पूर्वज परिवार) को इसका अधिकार है।

मातृ कुल और पितृ कुल दोनों के नष्ट हो जाने पर स्त्री ही इस क्रिया को करे अथवा (यदि स्त्री भी न हो तो) साथियों में से ही कोई करे या बांधवहीन मृतक के धन से राजा ही उसके संपूर्ण प्रेतकर्म को करवाने का अधिकारी होता है। हेमाद्रि (नान्दीपुराण) के अनुसार पिता की पिण्डदानादि संपूर्ण क्रिया पुत्र को ही करनी चाहिए। पुत्र के अभाव में पत्नी करे और पत्नी के अभाव में सहोदर भाई भी इस क्रिया को कर सकता है। मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि चूंकि राजा सभी वर्णों का बंधु होता है, अत: सभी श्राद्ध अधिकारी जनों के अभाव होने पर राजा उस मृत व्यक्ति के धन से उसके जाति के बांधवों द्वारा भली-भांति दाह आदि सभी और्ध्वदैहिक क्रिया करा सकता है। 

हालांकि कुछ लोग यह भी पूछते हैं कि क्या महिलाएं श्राद्ध कर सकती हैं? श्राद्ध संस्कार कराने का अधिकार वैसे तो पुरुष सदस्यों को ही प्राप्त है, कुछ खास स्थिति में महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है। वैदिक परंपरा के अनुसार महिलाएं यज्ञ, अनुष्ठान, संकल्प और व्रत आदि तो रख सकती है, लेकिन श्राद्ध की विधि को स्वयं नहीं कर सकती हैं। विधवा स्त्री अगर संतानहीन हो, तो अपने पति के नाम श्राद्ध का संकल्प रखकर ब्राह्मण या पुरोहित परिवार के पुरुष सदस्य से ही पिंडदान आदि का विधान पूरा करवा सकती है। इसी प्रकार जिन पितरों के कन्याएं ही वंश परंपरा में हैं, तो उन्हें पितरों के नाम व्रत रखकर उसके दामाद या नाती आदि ब्राह्मण को बुलाकर श्राद्धकर्म की निवृत्ति करवाना चाहिए। साधु-संतों के शिष्यगण या शिष्य विशेष श्राद्ध कर सकते हैं।

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