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02 August 2020

क्यों न कश्मीर घाटी के लोगों की भी परवाह की जाए ?


अगस्त का महीना देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है , कभी इसी महीने में आज़ादी के दीवानों ने भारत छोडो आन्दोलन सन 1942 में चलाया और जिसकी परिणिति आगे चल आज़ादी के रूप में देश के सामने आई, इसी महीने देश आज़ाद भी हुआ .

इसी महीने इस साल अयोध्या में मंदिर का निर्माण शुरू हो रहा है और इसी महीने पिछले साल पांच अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से धरा 370 और 35 ए के कुछ प्रावधानों को समाप्त किया गया – लेह लद्दाख को अलग किया गया और कश्मीर के घटी वाले हिस्से से सभी नागरिक अधिकार छीन लिए गये. सभी राजनितिक लोगों को बंदी बना लिया गया- यह एक कडवा सच है कि शेष भारत के लोगों को कश्मीर की ख़ूबसूरती, धरती के जन्नत , केसर और सेब तो चाहिए लेकिन वहां के वाशिंदों के मूलभूत हक छीने जाने पर देश ने कोई आवाज़ नहीं उठायी.यहाँ तक कि सरकार ने सेफुद्दीन सोज़ के मामले में झूठ बोला –सुप्रीम कोर्ट में और कोर्ट आँख पर पट्टी बांधे रहा .

बस कश्मीर से 370 के प्रावधान समाप्त होने के बाद वहां क्या हुआ / यह आप सभी जान लें , फिलहाल सभी को कोरोना से बचने, अपने रोजगार की चिंता और भव्य राम मंदिर और राफेल आने का हर्ष है , फिर भी देश कोई सत्तर लाख लोगों के मूलभूत अधिकार एक साल से छीने हुए हैं उसकी कोई किसी को परवाह नहीं- शुक्ल-मिश्रा लड्डू जरुर दूसरों के यहाँ पहुँचाने की योजना में लिप्त हैं । गत एक साल में कश्मीर घाटी के 4.56 लाख लोगों ने अपनी नौकरी खो दी है. इलाके की अर्थव्यवस्था को 40,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है जिसमे पर्यटन , खेती, हथकरघा से जुड़े लोगों के भुखमरी के दिन हैं . राज्य की छः हज़ार एकड़ ऐसी जमीन, जिस पर खेत होते औद्योगिक उद्देश्यों के लिए रखी गई है . आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2019 में 139 युवा आतंकवादी में शामिल हो गए। इस साल के पहले सात महीनों में, 90 स्थानीय लोग आतंकवादी समूहों में शामिल हो गए हैं, जो लगभग 13 प्रति माह है।

जनवरी से जून 2020 तक पाकिस्तान द्वारा 2,300 युद्धविराम उल्लंघनों के साथ हिंसा जारी रही है, जबकि पिछले साल इसी अवधि के दौरान 1,321 उल्लंघन हुए थे; समूचे 2019 में पाकिस्तान द्वारा कुल 3,168 युद्धविराम उल्लंघन हुए।
2019 और 2020 के पहले सात महीनों में नागरिक हत्याओं की संख्या लगभग समान है। जबकि 2019 में 23 नागरिक मारे गए थे, इस साल संख्या 22 है।
हालांकि, 2019 की तुलना में सुरक्षा बलों के कर्मियों की हत्या में कमी आई है। इस साल के पहले सात महीनों में 36 सुरक्षाकर्मियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, 2019 में इसी अवधि के लिए यह संख्या 76 थी। पिछले साल, 40 केंद्रीय रिजर्व पुलिस पुलवामा में 14 फरवरी को आतंकवादियों द्वारा किए गए एक भी आत्मघाती हमले में सेना के जवान मारे गए थे।
इस साल की शुरुआत से अब तक 145 आतंकवादी मारे गए, जबकि 2019 में इसी अवधि में 126 आतंकवादी मारे गए थे।

(वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)

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