श्राद्ध की गूढ़ बातें – कितनी पीढ़ियों तक कर सकते हैं श्राद्ध? - Bollyycorn

Breaking

Bollyycorn

Bollywood-Hollywood-TV Serial-Bhojpuri-Cinema-Politics News, Gadgets News

26 August 2020

श्राद्ध की गूढ़ बातें – कितनी पीढ़ियों तक कर सकते हैं श्राद्ध?

शास्त्रों का ऐसा मत है कि तीन पीढ़ियों तक ही श्राद्ध करना श्रेष्ठ है। तब तक प्रतीक्षाकाल समाप्त हो जाता है। इसलिए वार्षिक श्राद्ध, मासिक श्राद्ध और पितृ तर्पण करके हम अपने पितरों के लिए अन्न और जल की व्यवस्था करते हैं। कई बार यह प्रतीक्षाकाल लंबा हो जाता है। वैसे कहीं-कहीं प्रथम से सोलह पीढ़ी तक श्राद्ध करने की बात कही गई है। श्राद्ध करने के लिए पीढ़ियों को इस प्रकार से विभाजित किया गया है

  1. प्रथम पीढ़ी से तीसरी पीढ़ी तक।
  2. तीसरी पीढ़ी से पांचवीं पीढ़ी तक।
  3. पांचवीं पीढ़ी से सातवीं पीढ़ी तक।
  4. सातवीं पीढ़ी से ग्यारहवीं पीढ़ी तक।
  5. ग्यारहवीं पीढ़ी से सोलहवीं पीढ़ी तक।
पीढ़ी को ऐसे समझे
  • जिस प्रकार ऊपरी मंजिल तक पहुंचने के लिए सीढ़ी का सहारा होना जरूरी है, ठीक उसी तरह पितृ आत्माओं तक पहुंचने या उनके दर्शन करने के लिए पीढ़ी का सहारा लेना पड़ता है। यानी पीढ़ी शब्द का निर्माण पितरों से ही किया गया है। श्राद्ध का समय
  • प्रथम पीढ़ी में श्राद्ध करने का मतलब यह है कि घर का मुखिया श्राद्ध करे। घर के मुखिया को प्रथम पीढ़ी कहा जाता है और शास्त्रानुसार श्राद्ध करने का अधिकार मुखिया को ही होता है। जैसे किसी परिवार में पांच भाई हैं, तो जो सबसे बड़ा भाई होगा वही पितरों का श्राद्ध करेगा, उसके छोटे भाइयों द्वारा किया गया श्राद्ध मान्य नहीं होगा। मुखिया द्वारा किया गया श्राद्ध का फल आठ गुणा अधिक मिलता है। श्राद्ध का समय | श्राद्ध का समय
  • तीसरी पीढ़ी का मतलब है दादा, पिता और पोता। यानी पोता अपने दादा और पिता का श्राद्ध कर सकता है। कलियुग में तीन पीढ़ी तक का ही श्राद्ध प्रचलित है।
  • पांचवीं पीढ़ी को शास्त्रों की भाषा में परबाबा और लड़बाबा कहा जाता है। यानी तीन पीढ़ियों में दो पीढ़ी और जुड़ गई है परबाबा और लड़बाबा की। दूसरे शब्दों में इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि वर्तमान में जो परिवार का मुखिया है, वह अपने दादा के परदादाओं का भी श्राद्ध कर सकता है। मृतक परदादाओं को अधिपितृ कहा जाता है। श्राद्ध का समय
  • पांचवीं पीढ़ी में और पीढ़ियों को जोड़ दिया जाए, तो सातवीं पीढ़ी बन जाती है। परदादाओं के भी परदादा यानी पितरों के भी अधिपितृ सात पीढ़ी में माने जाते हैं। शास्त्रों में इस तरह की सात पीढ़ी को अधि-पित्रेश्वर कहा गया है। यानी परिवार का मुखिया अधि-पित्रेश्वरों का भी श्राद्ध कर सकता है। श्राद्ध का समय
  • अब इसी सातवीं पीढ़ी में अधिपित्रेश्वरों की पीढ़ियों को और जोड़ दिया जाए तो ग्यारह पीढ़ी बन जाती हैं और शास्त्रों में पितरों की इस पीढ़ी को पितृ नारायण कहते हैं। श्राद्ध का समय
  • श्राद्ध के लिए पीढ़ियों का अंतिम पड़ाव माना जाता है सोलहवीं पीढ़ी। इस पीढ़ी के पितरों को देव पितृ कहते हैं। इन्हें देव पितृ इसलिए कहते हैं, क्योंकि सोलहवीं पीढ़ी के पितृ देवलोक में समाहित हो जाते हैं। इनका पड़ाव यहीं समाप्त हो जाता है और वे प्रकृति में विलुप्त हो जाते हैं। एक तरह से उन्हें मुक्ति मिल जाती है। 
आपको ये पोस्ट कैसी लगी नीचे कमेंट करके अवश्य बताइए। इस पोस्ट को शेयर करें और ऐसी ही जानकारी पड़ते रहने के लिए आप बॉलीकॉर्न.कॉम (bollyycorn.com) के सोशल मीडिया फेसबुकट्विटरइंस्टाग्राम पेज को फॉलो करें।

No comments:

Post a Comment