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26 July 2020

Kargil Vijay Diwas: हमें रोटी नहीं सिर्फ गोली चाहिए थी, पढ़िए एक नायक का करगिस किस्सा

सर उस समय हमें कुछ भूख नहीं लग रही थी, हमें खाने नहीं बल्कि गोली चाहिये थी, जिससे हम दुश्मनों की जान ले सकें। ये शब्द उस हीरो के हैं, जिनसने कारगिल की लड़ाई में पाकिस्तान को धूल चटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, आज जब देश कारगिल लड़ाई में जीत के 21 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है और अपने वीर सैनिकों पर गर्व कर रहा है, नायक दीपचंद अपने उन दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं, उन्होने एक लीडिंग वेबसाइट से बात करते हुए कहा कि लड़ाई के समय वो सिर्फ थोड़ा सा खाना खाते थे, ताकि अगर मौका मिले, तो कोई कमी ना रह जाए।

सवाल- मई में जब युद्ध शुरु हुई तो आप कहां थे, आपको कब बताया गया कि आपको जंग के लिये जाना है।

जवाब- जब युद्ध की शुरुआत हुई, तो मैं बारामूला में था, वहां पर ऑपरेशन रक्षक चल रहा था, आतंकियों का एनकाउंटर किया जा रहा था, लेकिन हमें कारगिल के लिये स्टैंड बाय पर रखा गया था, क्योंकि नीचे से जब सेना आ रही थी, तो उन्हें समय था, ऐसे में हमे ही आगे जाने का आदेश मिल गया, जब वो कैप्टन कालिया का पार्थिव शरीर उठाने नहीं दे रहे थे, तब हमारी टीम वहां पहुंची, फायरिंग शुरु थी, शुरुआत में लगा कि सादी घुसपैठ है, लेकिन फिर पाकिस्तानी सेना आ गई।

सवाल- जब स्टैंड बाय के समय कुछ नहीं कर सकते थे, सिर्फ इंतजार करना था, तो जवानों का मूड कैसा रहता था, किस तरह की तैयारी कर रहे थे।

जवाब- हमें पता था कि हम स्टैंड बाय पर हैं, तो आगे नहीं जा रहे थे, लेकिन उस समय हमें बैकअप तैयार करने को कहा गया, घायलों को इकट्ठा करना, उनका इलाज करना, हथियारों की तैयारी करना, क्योंकि लड़ाई ऊपर लड़ी जा रही थी, हम नीचे थे।
सवाल- युद्ध के समय सैनिक को मदद कैसे मिल पाती है, खाना, जरुरत का सामान और बाकी सुविधाएं कैसे पूरी होती है।

जवाब- युद्ध के समय तो ताजा भोजन मिलने का सवाल ही नहीं होता, हम पैक का खाने ले जाते थे, साथ में कैल्शियम की गोली, बादाम-काजू की चीजें, बिस्कुट और कुछ ऐसी तीजें जिसे हम पतीले में गर्म करके खा लें, लेकिन अगर किसी पोस्ट को जीत लेते थे, तो हमें मौका मिलता था, अच्छा खाना खा लेते थे, वो भी मुश्किल होता था, क्योंकि जो बीच का समय मिलता था, उसमें हथियारों को संभालना और साफ करना पड़ता था। भूखा इंसान युद्ध नहीं लड़ सकता, लेकिन हम इतना खाते थे, कि लड़ सके, क्योंकि सामने दुश्मन था, तो हमें उन्हें खाने की जरुरत थी, हम तब कम पढे लिखे थे, कुछ और चिंता नहीं थी, बस हम ये चाहते थे, खाना बाद में दे देना, पहले देश के दुश्मनों से लड़ लें, क्योंकि अगर आप उन्हें नहीं मारोगे, तो वो आपको मार देगा, ऐसे समय में किसे भूख लगेगी।

सवाल- युद्ध के समय घरवालों से संपर्क होता था, क्या उन तक संदेश पहुंच पाता था
जवाब- उस समय घर वालों से बात करना काफी मुश्किल था, उन दिनों में सैटेलाइट फोन मिलता था, जिसमें अपनी बात रिकॉर्ड कर देते थे, तब हम जैसे जवानों के घरों में फोन नहीं होते थे, कभी-कभी अपनी बात पहुंचा देते थे।
सवाल- जब पाक सेना से आमना-सामना हुआ, तो टीम का क्या माहौल था, उस समय क्या प्लानिंग रही
जवाब- जब हम आगे पहुंचे, तो पाक सेना ऊंची पहाड़ी पर छिपी थी, इसलिये उन्हें फायदा मिल रहा था, क्योंकि ऊपर से आसानी होती है, वो हमें देख सकते थे, हमारी ओर से पूरी तैयारी थी, पाक सैनिक पंजाबी और हिंदी में भड़काऊ बातें करते थे, हमें उकसाते थे, लेकिन हमने भी करारा जवाब दिया।
सवाल- करगिल युद्ध से एक सैनिक होने के नाते क्या सीख मिली, क्या वो बातें है जो हमेशा याद रह जाती है।
जवाब- उस समय सिर्फ देश नजर आ रहा था, कि किसी भी तरह देश बचाना है, तब कोई सैनिक शिकायत नहीं करता था, जो भी सुविधा मिल जाए, जैसा भी हथियार मिले, जो भी खाने को मिल जाए, हमें पता था कि हमें ये मिल गया, तो इसी के साथ आगे बढना है, हमें जितनी सुविधाएं मिली है, उसी में दुश्मन से लड़ना है। जब युद्ध हुआ, तो उसके कुछ समय बाद संसद पर हमला हुआ था, उसके बाद एक हादसे में बम ब्लास्ट में मेरे दोनों हाथ-पैर को नुकसान पहुंचा था।
सवाल- कारगिल को 21 साल बीत चुके हैं, तब से कई सरकारें बदली, सरकार की ओर से सैनिकों के हीरो को किस तरह समर्थन और साथ मिलता है।

जवाब- जब देश की सेवा के लिये फौज में शामिल हुआ था, तो सरकार की ओर से किसको क्या मिला इससे फर्क नहीं पड़ता, हम सैनिक ये सब नहीं सोचते, कि शहीद होने के बाद कितना पैसा परिवार को मिलेगा, रुपया मिलना तो बोली लगाना हो गया, क्या हम देश के सैनिकों की जान की बोली लगाएंगे, जिंदा सैनिकों का सम्मान होना चाहिये, क्यों किसी को इज्जत देने के लिये मरने का इंतजार किया जाता है। सरकार की ओर से अलग-अलग समय में अलग-अलग तरह से मदद की जाती है, ऐसी मदद में भी भेदभाव क्यों किया जाता है, आज शहीद होने के बाद मेमोरियल के लिये जगह नहीं मिलती है।
सिर्फ सोशल मीडिया पर देशप्रेम

नायक दीपचंद ने कहा कि आज लोगों को सिर्फ 26 जनवरी और 15 अगस्त के साथ विजय दिवस के दिन ही सैनिकों की याद आती है, लेकिन क्या बाकी साल हम देश की रक्षा नहीं करते, नेता और सरकारें वादें करती है, लेकिन उसे पूरा नहीं करती, आज कई संस्थाएं हैं जो दिखावे के लिये बुलाती है, सिर्फ नाम का ऐलान करती है, लेकिन कुछ संस्थाएं ऐसी भी है, जो हमारा सम्मान करती है, आज का युवा सिर्फ फेसबुक-ट्विटर पर ही देशभक्ति दिखा है, मैं रेल में सफर करता हूं, कहता हूं कि मैं अपाहिज हूं, तब भी कोई अपनी सीट पर बैठने नहीं देता है, कहता है कि मैंने 4 महीने पहले सीट बुक की थी, आप सैनिक को अपनी सीट पर बैठने के लिये जगह नहीं दे सकते, और सोशल मीडिया पर देशभक्ति की बातें करते हैं।
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