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26 July 2020

जानिए करिगल युद्ध के 20 हीरो के बारे में जिन्होंने अपनी जान गवांकर देश की रक्षा की, नंबर 1 पर बन रही है फिल्म

कारगिल विजय दिवस के मौके पर आज देशभर में शहीदों को श्रद्धांजलि दी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ इस दिन के कई किस्से भी यादों के पिटारे से भी निकल रहे हैं। कारगिल युद्ध में जवानों का नेतृत्व करने वाले सेना के अधिकारियों से लेकर उन जांबाजों तक के बारे में जानिए, जिन्होंने अपनी जान गंवाकर भारत भूमि की रक्षा की थी।
 लेफ्टिनेंट शींग क्लिफोर्ड नोंग्रुमशहीद नोंग्रुम जम्मू कश्मीर लाइट इनफेंट्री की 12वीं बटालियन में थे. वह वीरगति को 1 जुलाई 1999 को प्राप्त हुए. वह उस समय शहीद हुए जब कारगिल युद्ध के दौरान प्वांइट 4812 को कब्जा कर रहे थे. नोंगुर्म को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.मेजर पदमपानी आचार्यशहीद आचार्य राजपूताना राइफल्स की बटालियन में थे. 28 जून 1999 को लोन हिल्स पर दुश्मनों के हाथों वीरगति को प्राप्त हो गए थे. सरकार ने कारगिल हिल पर उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया था.कर्नल सोनम वांगचुकवांगचुक लद्दाख स्काउट रेजिमेंट में अधिकारी थे. कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते हुए वांगचुक कॉरवट ला टॉप पर वीरता से लड़े और युद्ध ख़त्म होने पर वापस लौटे. उन्हें बाद में महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था.मेजर विवेक गुप्ताशहीद गुप्ता राजपूताना राइफल्स की सेकेंड बटालियन में थे. 12 जून 1999 को द्रास सेक्टर में एक महत्वपूर्ण पोस्ट पर कब्जा किए जाने के दौरान वह वीरगति को प्राप्त हुए थे. कारगिल युद्ध में उनकी वीरता को देखते हुए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया.कैप्टन मनोज कुमार पांडेशहीद मनोज गोरखा राइफल्स के फर्स्ट बटालियन में थे. वह ऑपरेशन विजय के महानायक थे. उन्होंने 11 जून को बटालिक सेक्टर में दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे. वहीं उनके ही नेतृत्व में सेना की टुकड़ी ने जॉबर टॉप और खालुबर टॉप पर सेना ने वापस कब्जा किया था. वह दिन तीन जुलाई 1999 का था. पांडेय ने अपनी चोटों की परवाह किए बिना तिरंगा लहराया और परमवीर चक्र से सम्मानित किए गए.
कैप्टन विक्रम बत्रा
बत्रा वही हैं, जिन्होंने कारगिल के प्वांइट 4875 पर तिरंगा फहराते हुए कहा था यह दिल मांगे मोर। विक्रम 13वीं जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में थे। विक्रम तोलोलिंग पर पाकिस्तानियों द्वारा बनाए गए बंकर पर न केवल कब्जा किया बल्कि गोलियों की परवाह किए बिना ही अपने सैनिकों को बचाने के लिए 7 जुलाई 1999 को पाकिस्तानी सैनिकों को सीधे भिड़ गए। आज उस चोटी को बत्रा टॉप के नाम से जाना जाता है। सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र देकर सम्मानित किया।
ब्रिगेडियर खुशाल सिंह
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के खुशाल ठाकुर सेना से रिटायरमेंट के बाद सक्रिय राजनीति में आए। कारगिल युद्ध में इनके और इनकी बटालियन को दुश्मनों के छक्के छुड़ाने पर सबसे ज्यादा बहादुरी सम्मान मिले थे। ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने जिस 18 ग्रनेडियर का नेतृत्व किया उसमें 900 जवान थे। इनकी कमान के 34 जवान शहीद हुए और सबसे ज्यादा 52 वीरता पुरस्कार भी इनकी कमान को ही मिले थे। इसमें 1 परमवीर चक्र, 2 महावीर चक्र, 6 वीरचक्र और 18 सेना मेडल सहित अन्य सैन्य सम्मान भी शामिल थे। खुद ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर युद्ध सेवा मेडल जैसे सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।
मेजर अजय प्रसाद
जब कारगिल युद्ध छिड़ा तब सैकड़ों वीर जवानों ने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। इन जांबाज जवानों में मध्य प्रदेश के सपूत भी शामिल थे। मेजर अजय प्रसाद उन चुनिंदा सैनिकों में शामिल थे, जिन्होंने कारगिल युद्ध की शुरुआती जंग में दुश्मनों से लोहा लिया था। सेना में शामिल होने के बाद से वे श्रीलंका में लिट्टे से भिड़े। वहां कामयाबी के बाद मिजोरम में उल्फा उग्रवादियों को नेस्तनाबूद किया और फिर पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ाते हुए कारगिल युद्ध में शहीद हो गए।
मेजर राजेश अधिकारी
मेजर राजेश अधिकारी की एक वर्ष पहले ही शादी हुई थी। शाम के समय युद्ध क्षेत्र के पास मेजर राजेश अधिकारी के घर से आया हुआ खत पहुंचा, लेकिन मेजर राजेश अधिकारी ने खत पढ़ने से यह कहकर मना कर दिया कि पहले दुश्मनों को निपटा आता हूं और खत सुबह पढ़ लूंगा। रात भर युद्ध में डटे रहने के बाद तोलोलिंग पर मेजर राजेश अधिकारी और उनकी टीम ने कब्जा तो जमा लिया लेकिन खत पढ़ने के लिए वह जीवित न रह सके। मेजर राजेश सिंह अधिकारी की वीरता कार्य के लिए सरकार ने उन्हें गैलेंट्री सम्मान महावीर चक्र से सम्मानित किया।
 कैप्टन दीपक गुलेरियाकारगिल युद्ध में हिमाचल प्रदेश से 52 सूरमाओं ने अपनी जान दी. कैप्टन विक्रम बत्रा, सौरव कालिया के अलावा कई वीरों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया. इन्हीं में से एक थे हिमाचल के मंडी जिले के सरकाघाट से कैप्टन दीपक गुलेरिया. उन्होंने महज 29 साल की उम्र में अपने प्राणों की आहुति दे दी. उन्हें उनके इस बलिदान के लिए गैलेंट्री अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया.कैप्टन अनुज नैय्यरशहीद अनुज जाट रेजिमेंट की 17वीं बटालियन में थे. 7 जुलाई 1999 को वह टाइगर हिल पर दुश्मनों का दांत खट्टे करते हुए शहीद हुए. कैप्टन अनुज की वीरता को सरकार ने मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.कैप्टन एन केंगुर्सूशहीद केंगुर्सू राजपूताना राइफल्स के बटालियन में थे. वह कारगिल युद्ध के दौरान लोन हिल्स पर 28 जून 1999 को दुश्मनों को पटखनी देते हुए शहीद हो गए थे. युद्ध के मैदान में दुश्मनों को खदेड़ देने वाले इस योद्धा को सरकार ने मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया.
सिपाही कृष्ण कुमार
हरियाणा के सिरसा के गांव तरकांवाली के सिपाही कृष्ण कुमार ने भी देश के खातिर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। जयसिंह बांदर का 25 वर्षीय पुत्र कृष्ण कुमार कारगिल युद्ध के समय जाट रैजिमेंट में सिपाही के पद पर तैनात था। कृषक जय सिंह के चार पुत्रों में सबसे छोटा कृष्ण ही था। शुरू से ही उसमे देश सेवा का जज्बा था। परम्परागत कृषि कार्य को छोड़कर उसने फौज में जाने का फैसला लिया। इस नौजवान ने देश सेवा के लिए सेना को चुना और शहादत से करीब दो वर्ष पूर्व ही जाट रैजिमेंट में भर्ती हुआ। कारगिल युद्ध में कृष्ण कुमार जैसे अनेक वीर शहीद हुए थे।
जयराम सिंह
कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले जयराम सिंह को उनकी वीरता के लिए राष्ट्रपति ने वीर चक्र से नवाजा तो परिवार ही नहीं, बल्कि राजस्थान का पूरा सीकर जिला गौरान्वित हो उठा था। कारगिल युद्ध का जिक्र करते ही जयराम की आंखों के सामने वही पुराना मंजर आ जाता है। वो बताते हैं कि किस तरह से उन्हें 25 अप्रेल 1999 को करगिल में दुश्मन के घुसपैठ करने की सूचना मिली थी। उसके बाद वे अपनी कंपनी के साथ दुश्मनों से लोहा लेने निकल पड़े थे। करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर पर स्थित तेलोलिंग पहाड़ी जिस पर पाकिस्तानी सेना ने अपना कब्जा कर रखा था, उसको छुड़ाने का ज़िम्मा इन्हें दिया गया था। जयराम सिंह कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले जयराम सिंह को उनकी वीरता के लिए राष्ट्रपति ने वीर चक्र से नवाजा तो परिवार ही नहीं, बल्कि राजस्थान का पूरा सीकर जिला गौरान्वित हो उठा था। कारगिल युद्ध का जिक्र करते ही जयराम की आंखों के सामने वही पुराना मंजर आ जाता है। वो बताते हैं कि किस तरह से उन्हें 25 अप्रेल 1999 को करगिल में दुश्मन के घुसपैठ करने की सूचना मिली थी। उसके बाद वे अपनी कंपनी के साथ दुश्मनों से लोहा लेने निकल पड़े थे। करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर पर स्थित तेलोलिंग पहाड़ी जिस पर पाकिस्तानी सेना ने अपना कब्जा कर रखा था, उसको छुड़ाने का ज़िम्मा इन्हें दिया गया था।
 एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिसकारगिल युद्ध के समय एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस थे. कारगिल युद्ध के समय टिपनिस ने अपनी टीम के साथ एयर फोर्स का कुशल नेतृत्व किया था. 18 हज़ार फीट की ऊंचाई से सेना को हवाई मदद देने की चुनौती को बखूबी अंजाम देने में टिपनिस और उनकी फोर्स ने अपनी कुशलता का परिचय देकर इतिहास रचने में मदद की थी.
कैप्टन विजयंत थापर
मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विजयंत थापर ने शहादत से पहले 13 जून 1999 को तोलोलिंग की पहाड़ियों पर जीत का झंडा फहराया था। ये महत्वपूर्ण जीत कारगिल की जंग के दौरान भारत के हक में एक निर्णायक लड़ाई साबित हुई। तोलोलिंग की जीत के बाद 28 जून को कैप्टन विजयंत थापर को थ्री-पिंपल्स नाम की पहाड़ी को पाकिस्तानियों के कब्जे से आज़ाद कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बेहद मुश्किल हालात में लड़ी गई इस जंग में कैप्टन विजयंत ने दुश्मनों के खिलाफ बेमिसाल बहादुरी दिखाई और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर अमर हो गए।
एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस
कारगिल युद्ध के समय एयर चीफ मार्शल अनिल यशवंत टिपनिस थे। कारगिल युद्ध के समय टिपनिस ने अपनी टीम के साथ एयर फोर्स का कुशल नेतृत्व किया था। 18 हज़ार फीट की ऊंचाई से सेना को हवाई मदद देने की चुनौती को बखूबी अंजाम देने में टिपनिस और उनकी फोर्स ने अपनी कुशलता का परिचय देकर इतिहास रचने में मदद की थी।
कैप्टन दीपक गुलेरिया
कारगिल युद्ध में हिमाचल प्रदेश से 52 सूरमाओं ने अपनी जान दी। कैप्टन विक्रम बत्रा, सौरव कालिया के अलावा कई वीरों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। इन्हीं में से एक थे हिमाचल के मंडी जिले के सरकाघाट से कैप्टन दीपक गुलेरिया। उन्होंने महज 29 साल की उम्र में अपने प्राणों की आहुति दे दी। उन्हें उनके इस बलिदान के लिए गैलेंट्री अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया।
कैप्टन अनुज नैय्यर
शहीद अनुज जाट रेजिमेंट की 17वीं बटालियन में थे। 7 जुलाई 1999 को वह टाइगर हिल पर दुश्मनों का दांत खट्टे करते हुए शहीद हुए। कैप्टन अनुज की वीरता को सरकार ने मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
कैप्टन एन केंगुर्सू
शहीद केंगुर्सू राजपूताना राइफल्स के बटालियन में थे। वह कारगिल युद्ध के दौरान लोन हिल्स पर 28 जून 1999 को दुश्मनों को पटखनी देते हुए शहीद हो गए थे। युद्ध के मैदान में दुश्मनों को खदेड़ देने वाले इस योद्धा को सरकार ने मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।
लेफ्टिनेंट शींग क्लिफोर्ड नोंग्रुम
शहीद नोंग्रुम जम्मू कश्मीर लाइट इनफेंट्री की 12वीं बटालियन में थे। वह वीरगति को 1 जुलाई 1999 को प्राप्त हुए। वह उस समय शहीद हुए जब कारगिल युद्ध के दौरान प्वांइट 4812 को कब्जा कर रहे थे। नोंगुर्म को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
मेजर पदमपानी आचार्य
शहीद आचार्य राजपूताना राइफल्स की बटालियन में थे। 28 जून 1999 को लोन हिल्स पर दुश्मनों के हाथों वीरगति को प्राप्त हो गए थे। सरकार ने कारगिल हिल पर उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया था।
कर्नल सोनम वांगचुक
वांगचुक लद्दाख स्काउट रेजिमेंट में अधिकारी थे। कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते हुए वांगचुक कॉरवट ला टॉप पर वीरता से लड़े और युद्ध ख़त्म होने पर वापस लौटे। उन्हें बाद में महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
मेजर विवेक गुप्ता
शहीद गुप्ता राजपूताना राइफल्स की सेकेंड बटालियन में थे। 12 जून 1999 को द्रास सेक्टर में एक महत्वपूर्ण पोस्ट पर कब्जा किए जाने के दौरान वह वीरगति को प्राप्त हुए थे। कारगिल युद्ध में उनकी वीरता को देखते हुए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया।
कैप्टन मनोज कुमार पांडे
शहीद मनोज गोरखा राइफल्स के फर्स्ट बटालियन में थे। वह ऑपरेशन विजय के महानायक थे। उन्होंने 11 जून को बटालिक सेक्टर में दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। वहीं उनके ही नेतृत्व में सेना की टुकड़ी ने जॉबर टॉप और खालुबर टॉप पर सेना ने वापस कब्जा किया था। वह दिन तीन जुलाई 1999 का था। पांडेय ने अपनी चोटों की परवाह किए बिना तिरंगा लहराया और परमवीर चक्र से सम्मानित किए गए।
नायक दिगेंद्र कुमार
शहीद दिगेंद्र राजपूताना राइफल्स के सेकेंड बटालियन में थे। उनकी कारगिल युद्ध में अदम्य साहस के लिए सरकार ने 15 अगस्त 1999 को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। ये जिंदा वापस लौटे थे।
राइफल मैन संजय कुमार
शहीद संजय 13 जम्मू और कश्मीर राइफल्स में थे। वह स्काउट टीम के लीडर थे और उन्होंने फ्लैट टॉप को अपनी छोटी टुकड़ी के साथ कब्जा किया। वह एक जाबांज योद्धा थे उन्होंने दुश्मनों की गोली सीने पर खाई थी। गोली लगने के बाद भी वह दुश्मनों का दांत खट्टा किया। छोटी सी टुकड़ी के साथ उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया, इसके बाद राइफल मैन कुमार को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। ये जिंदा वापस लौटे थे।
ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
शहीद योगेंद्र कमांडो प्लाटून को गाइड करने वाले ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव थे। जिन्होंने एक चक्र के साथ टाइगर हिल पर एक स्ट्रैटजी बना कर बंकर पर हमला किया। वह अपनी पलटन के लिए रस्सी का रास्ता बनाते थे। 4 जुलाई को उन्होंने कारगिल युद्ध के दौरान अदम्य साहस के लिए योगेंद्र को सरकार ने परमवीर चक्र से सम्मानित किया। ये जिंदा वापस लौटे थे।
हवलदार डोला राम
कारगिल युद्ध के शहीद हवलदार डोला राम का जन्म 17 जनवरी, 1965 को कुल्लू जिला के नित्थर क्षेत्र के गाव शकरोली में हुआ था। दसवीं की परीक्षा के बाद विद्यार्थी जीवन से ही उनमें देश सेवा का जज्बा था। वह पांच अगस्त, 1985 को प्रथम पैराशूटर रेजिमेंट में भर्ती हुए। तीन जुलाई, 1999 को कारगिल के द्रास सेक्टर में मुठभेड़ में अंतिम सास तक बहादुरी से लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुए। ऑपरेशन रक्षक में सम्मिलित डोला राम ने द्रास सेक्टर में जीवन बलिदान किया था।
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